Wednesday, 17 January 2018

यात्रा वृत्तांत : आरंग से बारंग तक

                                          

 आपको यह शीर्षक अटपटा लग रहा होगा। जानना चाहते होंगे कि अ से ब की यह तुक मैंने क्यों मिलाई है! यह रहस्य कुछ देर में खुलेगा। अभी इतना जान लीजिए कि निरन्तर चलती यात्राओं के क्रम में पिछले दिनों मैं एक दिन के लिए भुवनेश्वर हो आया। वह भी साल के आखिरी दिन अर्थात 31 दिसम्बर 2017 को। सुबह पहुंचा और रात की रेल से रायपुर के लिए वापिस रवाना। कुल जमा चौदह घंटे का प्रवास। पिछले चालीस सालों में कई बार ओडिशा जाना हुआ है। उस समय से जब नक्शे पर उसका नाम उड़ीसा था। जब भी गया हूं, कुछ न कुछ नया देखने-समझने मिला है। 1977 में जब सुपर साईक्लोन आया, तब मैं सपरिवार पुरी में था। धुआंधार बारिश के बीच पुरी से भुवनेश्वर, चिलका, बरहामपुर, कोरापुट होते हुए रास्ते में दो रात बिताकर जगदलपुर किसी तरह पहुंच पाए थे। पहुंचते साथ अखबार का शीर्षक- उड़ीसा में साईक्लोन से सात हजार मृत- देखकर कलेजा कांप उठा था। रास्ते में दो रातें, पहली घने जंगल के बीच मोहाना के डाक बंगले में, दूसरी जैपुर-जगदलपुर के बीच हाईवे पर बोरीगुमा के रेस्ट हाउस में मूसलाधार वर्षा के बीच कैसे बीती थीं, याद कर आज भी रोमांच हो आता है।
बाद की लगभग सभी यात्राएं निरापद ही बीतीं। इस बार की ही तरह। रायपुर रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्मों पर लगीं लिफ्टें काम कर रही है। इतने व्यस्त स्टेशन पर सिर्फ छह लोगों के लिए बनी लिफ्ट पर्याप्त नहीं है, लेकिन एक नई सुविधा तो जुट ही गई है। अब जब स्टेशन पर भारवाहक मिलना दुर्लभ हो गया है, तब इस सुविधा का महत्व समझ आता है। दुर्ग से चलने वाली ट्रेन रायपुर आते-आते दस मिनिट लेट हो गई और प्लेटफार्म भी बदलना पड़ा, लेकिन इन छोटी-मोटी तकलीफों के हम अभ्यस्त हो चुके हैं। दिक्कत तब हुई जब मालूम पड़ा कि प्रसाधन कक्ष में पानी नहीं है। मैंने रेल मंत्री को ट्विटर किया लेकिन कोई उत्तर नहीं आया। वहां सिर्फ प्रायोजित ट्विटर का ही जवाब दिया जाता है, यह मैं अनुभव से जान चुका हूं। खैर, काटाभांजी स्टेशन पर पानी भर दिया गया। यह प्रसन्नता की बात थी कि डिब्बा नया नकोर था, साफ-सुथरा और कंबल, चादर, टावेल भी एकदम नए थे। कटक के पहले तक ट्रेन बिलकुल समय पर चल रही थी, लेकिन कटक-भुवनेश्वर की 20-25 किमी की दूरी तय करने में पैंतालीस मिनिट अतिरिक्त लग गए। भुवनेश्वर एक व्यस्त स्टेशन है, वहां प्लेटफॉर्म अक्सर खाली नहीं रहते और ट्रेनें इस वजह से लेट हो ही जाती हैं।
मैं भुवनेश्वर गया था एक साहित्यिक कार्यक्रम में भाग लेने। भुवनेश्वर साहित्य समाज नामक संस्था दिसंबर के अंतिम रविवार को अपना वार्षिकोत्सव मनाती है। संयोग से इस साल 31 दिसंबर को ही रविवार था। साल का आखिरी दिन, वह भी रविवार और फिर लगभग उसी समय ओडिशा साहित्य परिषद का एक वृहत् कार्यक्रम। संस्था के अध्यक्ष सुकवि सूर्य मिश्र से चर्चा करते हुए मन में आशंका हुई कि मुझे शायद लगभग खाली सभाकक्ष में ही अपना व्याख्यान देना होगा। किन्तु मेरी आशंका निर्मूल थी। सुबह साढ़़े दस बजे ओडिशा औद्योगिक विकास निगम का सुसज्जित सभाकक्ष तीन-चौथाई भर चुका था। दो सौ से अधिक की सभा में आधी नहीं तो एक तिहाई से ज्यादा महिलाओं की उपस्थिति प्रीतिकर थी। मेरे लिए अपने पुराने मित्रों कथाकार जापानी और कवि तरुण कानूगो से काफी समय के बाद भेंट होना भी प्रसन्नता का कारण था।
भुवनेश्वर साहित्य समाज के इस आयोजन में भाग लेना एक ताजगीभरा अनुभव था। मैंने अपने वक्तव्य में कहा कि जब एक पूरा साल सुख-दुख, आशा-निराशा, क्षोभ-हताशा के बीच झूलते हुए बीत गया हो, तब कम से कम साल का अंतिम दिन समानधर्मा मित्रों के साथ बीतना आश्वस्त करता है कि नया साल पूर्वापेक्षा बेहतर गुजरेगा। इस कार्यक्रम की कुछ झलकियां पाठकों के लिए रुचिकर होंगी। भुवनेश्वर के रचनाकारों की यह संस्था मुख्यत: ओडिआ भाषी लेखकों की है, लेकिन इस बीच उसने ओडिआ रचनाओं के हिंदी अनुवाद की तीन पुस्तकें प्रकाशित की हैं। एक कहानी संकलन और दो कविता संग्रह। मुझे 'तपती रेत पर हरसिंगार' शीर्षक कविता संग्रह को लोकार्पित करने का सुखद सुयोग मिला। इसमें ओडिआ के सौ कवियों की एक-एक कविता संकलित है। ये सारी कविताएं आधुनिक भावबोध की हैं और संपादक राधू मिश्र ने इन्हें नई सदी की कविताएं निरूपित किया है। कविताओं को पढ़कर ओडिआ साहित्य के प्रति मेरी समझ विकसित होने में सफलता मिली है, ऐसा कहूं तो अतिशयोक्ति न होगी। भुवनेश्वर साहित्य समाज ने इसी तरह अपने लेखकों की रचनाओं के तीन अंग्रेजा अनुवाद भी प्रकाशित किए हैं।
इसी आयोजन में मेरे सामने यह भी स्पष्ट हुआ कि ओडिआ में महिला रचनाकारों की एक समृद्ध परंपरा है। कार्यक्रम में जो देवियां उपस्थित थीं, उनमें से स्वाभाविकत: अधिकतर साहित्य-प्रेमी थीं, किंतु लेखिकाओं की संख्या कम नहीं थी। हिंदी में अनूदित कविता संग्रह में अनेक रूपांतर भी उनके ही किए हुए हैं। एक दिलचस्प तथ्य यह भी है कि कार्यक्रम का मुख्य पर्व लगभग एक बजे समाप्त हो गया था। उसके बाद काव्य पाठ होना था। मंच पर पांच कवि विराजमान थे और वे बारी-बारी से मंच संचालन कर रहे थे। मैं कुछ देर ठहरकर लौट आया था। बाद में मालूम पड़ा कि कविता पाठ का सिलसिला शाम पांच बजे तक चलता रहा। करीब पचास कवियों ने अपनी कविताएं पढ़ीं। इससे पता चलता है कि कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत एक है। कोई बिरला ही होगा, जो मंच पर जाकर कविता सुनाने का लोभ संवरण कर पाता हो। फिर भी मैंने जितना उन कवियों को समझा उससे अनुमान लगाता हूं कि वहां कविता के नाम पर जोकराई नहीं हुई होगी, चुटकुले नहीं सुनाए गए होंगे।
भुवनेश्वर मुझे हमेशा से एक उनींदा नगर प्रतीत होते रहा है। जब पहली बार गया था तो दोपहर का भोजन नसीब नहीं हुआ था। सारे होटलों के दरवाजे बंद थे। वही हाल बाजार के। दोपहर एक से चार तक भुवनेश्वर विश्राम किया करता था। अब समय बदल गया है। रविवार को सामान्यत: बाजार बंद रहता है। इस बार शायद इकतीस दिसंबर के कारण खुला हुआ था और अच्छी-खासी चहल-पहल थी। पुरी-भुवनेश्वर पर्यटन के बड़े केंद्र हैं इसलिए रेलवे स्टेशन, होटल, रेस्तोरां सब में पर्यटकों की भी आवाजाही खूब थी। विदेशी सैलानी तो इक्का-दुक्का ही दिखे, किंतु देश के विभिन्न क्षेत्रों से आए पर्यटक रेलगाड़ी में भी थे और होटल में भी। यह कहना होगा कि ओडिशा ने पर्यटन व्यवसाय को गंभीरतापूर्वक बढ़ावा दिया है। भुवनेश्वर में हर श्रेणी के होटल और रेस्तोरां हैं, हस्तशिल्प और हाथकरघे की मार्केटिंग भी भली-भांति हो रही है। 
अब बात इस लेख के शीर्षक की। भुवनेश्वर का तेजी के साथ कायाकल्प हो रहा है। एक नया शहर कटक की ओर बढ़ते जा रहा है। वर्षों पूर्व आईआरसी नगर (इंडियन रोड कांग्रेस) उस संस्था के अधिवेशन के नाम पर राष्ट्रीय राजमार्ग पर बसाया गया था, वह शहर के बीच में आ गया है। उदयगिरि, खंडगिरि और नंदनकानन भी अब महानगर का हिस्सा बन चुके हैं, उधर पुरी की दिशा में धौली भी। कटक और भुवनेश्वर के बीच एक नया रेलवे स्टेशन बन रहा है- भुवनेश्वर न्यू स्टेशन। इस पर आठ या बारह प्लेटफॉर्म होंगे तथा आधी गाड़ियां पुराने स्टेशन के बजाय यहां रुका करेंगी। पटिया नाम का एक छोटा सा गांव था, अब वहां पटिया पैसिंजर हॉल्ट स्टेशन बन गया है।
भुवनेश्वर के पुराने स्टेशन पर लिफ्ट है, जिसमें बीस लोग सवार हो सकते हैं। वहां जुडिशरी, मीडिया और पे्रस का विशेष पार्किंग स्थल भी है। मंचेश्वर नामक एक और स्टेशन विस्तार ले रहा है। अब रहस्योद्घाटन। रायपुर से रवाना हुआ तो थोड़ी देर में आरंग स्टेशन आया। भुवनेश्वर पहुंचने को हुआ तो नगर सीमा पर बारंग स्टेशन पड़ा। हिंदी से ओडिआ। छत्तीसगढ़ से ओडिशा। 'अ' से 'ब' तक का सफर यूं पूरा हुआ। रायपुर पहुंचा तो चलित सीढ़ी याने एस्केलेटर से नीचे उतरा। यह एक अतिरिक्त सुविधा देखी। लेकिन कार पार्किंग की जो दुर्दशा देखी, उससे मन खिन्न हुआ। ऐसा लगा कि स्वच्छ भारत अभियान की सफलता के लिए स्वयं नरेन्द्र मोदी को रायपुर रेलवे स्टेशन आना पड़ेगा।
देशबंधु में 18 जनवरी 2018 को प्रकाशित 

Wednesday, 10 January 2018

यात्रा वृत्तांत : मणिपुर : जहां तिरंगा फहराया था

                                    
                                  

 मणिपुर में एप्सो की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के लिए देश के लगभग बीस प्रांतों से प्रतिनिधि आए थे। हममें से अधिकतर की यह पहली मणिपुर यात्रा थी इसलिए औपचारिक बैठकों के बाद जब दो-एक दर्शनीय स्थलों के भ्रमण की सूचना मिली तो सबके सब बहुत उत्साहित हुए। हमें जाना बहुत दूर नहीं था। इम्फाल से कोई पैंतालीस किलोमीटर दूर मोइरांग और वहां से दस किलोमीटर आगे लोकटाक झील। एक दिन में इससे अधिक देख भी क्या सकते थे? शाम होते-होते तक लौटना भी था। मणिपुर पूर्व में है इसलिए हमारी घड़ी से सूर्योदय पांच बजे के पहले हो जाता है और शाम चार-साढ़े चार बजे से अंधेरा घिरने लगता है। लोग-बाग अपना काम समेटने लगते हैं और छह बजे तक सड़कें वीरान हो जाती हैं। हम लोग नौ तारीख की सुबह चलने के लिए तैयार थे किन्तु पिछली रात से बारिश होना शुरू हो गई थी और रुकने का नाम नहीं ले रही थी। लेकिन हमारे उत्साह में कोई कमी नहीं थी। छाता मिल गया तो ठीक नहीं तो भीगते-भागते बसों और अन्य गाड़ियों में बैठ गए।
मणिपुर के साथियों ने बताया कि इस समय यह बारिश असामान्य हैं, जब जाड़ा पड़ने लगता है तब यहां बारिश नहीं होती है। इस बात से यही निष्कर्ष निकाला कि बदलते मौसम के असर से कोई भी इलाका बच नहीं पा रहा है। इम्फाल शहर पार किए कुछ किलोमीटर ही हुए होंगे कि विष्णुपुर जिला प्रारंभ हो गया। यहां से ग्रामीण जीवन की छटा देखने मिली। पुरानी शैली के टीन की छत वाले मकान, अनेक घर मिट्टी के ही थे। साधन-सम्पन्न लोगों के घर अवश्य पक्के बने थे। इस रास्ते पर मोइरांग के पहले जिन गांवों से गुजरे उनमें सब जगह महिलाएं ही दुकानदारी करते दिखीं। हर गांव में पुलिस का भी ऐसा ज़बर्दस्त बंदोबस्त देखने मिला जो सामान्यत: हम अपने यहां नहीं देखते। प्राय: हरेक गांव में जलापूर्ति के लिए सरकार द्वारा निर्मित जलाशय देखने में आए। उन पर बाकायदा सूचनाफलक लगे थे कि गांव की जलप्रदाय व्यवस्था के लिए इन्हें बनाया गया है। मोइरांग पहुंचने के लगभग दस किलोमीटर पहले लोकटाक झील का एक सिरा दिखाई देने लगा था।
मोइरांग ऐतिहासिक स्थान है। इस गांव का नाम स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में होना चाहिए। 18 अप्रैल 1944 को यहां पर आजाद हिन्द फौज के मतवाले और बहादुर सैनिकों ने पहली बार भारत भूमि पर तिरंगा ध्वज फहराया था। बर्मा से पश्चिम की ओर बढ़ते हुए आजाद हिन्द फौज का दस्ता मोइरांग, फिर आगे नगालैंड के कोहिमा तक पहुंच गया था। जापान के नेतृत्व में आईएनए लड़ रही थी। नेताजी का सपना था कि इस सहयोग के द्वारा वे भारत को मुक्त करा सकेंगे। सो कुछ दिनों के लिए सही मोइरांग और उसके आगे-पीछे के इलाके में आजाद हिन्द फौज द्वारा मातृभूमि को आजाद कर लिया गया था। यह अलग बात है कि स्वतंत्रता मिलने का दिन अभी दूर था। आईएनए की इस मुहिम में देश के सभी भागों के सैनिक थे जो सिंगापुर और मलाया में नेताजी सुभाषचन्द्र बोस के आह्वान पर ब्रिटिश फौज छोड़कर चले आए थे।
मोइरांग की अस्त-व्यस्त नगरीय संरचना के बीच एक संकरी सड़क पर आजाद हिन्द फौज का स्मारक बना है। इस जगह पहुंच कर हमारा हृदय रोमांचित हो उठा और आजादी के लिए अपने प्राणों की बाजी लगा देने वाले वीर सैनिकों को श्रद्धांजलि देने के लिए अपने आप माथा झुक गया। जिस जगह तिरंगा फहराया गया था वहां कॉटेजनुमा एक कक्ष बना हुआ है। इसके सामने एक अन्य स्मारक है। नेताजी ने सिंगापुर में 6 जुलाई 1945 को आईएनए के शहीदों के लिए एक स्मारक की बुनियाद रखी थी। श्रीमती इंदिरा गांधी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद उस स्मारक की प्रतिकृति यहां स्थापित करने का निर्णय लिया, जिसकी आधारशिला 21 अक्टूबर 1968 को तत्कालीन केन्द्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री के.के. शाह के द्वारा रखी गई और 23 सितंबर 1969 को इंदिराजी ने स्वयं यहां पहुंच कर इस शहीद स्तंभ का अनावरण कर उसे देश को समर्पित किया। हम सबने यहां अपने वीर शहीदों को फूल चढ़ाकर उन्हें सलामी दी।
मुझे यह बताना चाहिए कि नेताजी सुभाषचन्द्र बोस और आजाद हिन्द फौज दोनों की स्मृति में यहां एक विस्तृत परिसर विकसित किया गया है जिसमें ध्वाजारोहण स्थल और शहीद स्तंभ तो हैं ही, उनके अलावा कुछ और भी है। यहां एक सुसज्जित प्रेक्षागृह और साथ में एक पुस्तकालय है। इसका नाम नेताजी लाइब्रेरी है। 1968 में आजाद हिन्द फौज की रजत जयंती के अवसर पर इंदिरा सरकार के एक अन्य वरिष्ठ मंत्री और जाने-माने विद्वान डॉ. त्रिगुण सेन ने 21 अक्टूबर को ही इस लाइब्रेरी का लोकार्पण किया था। यह नोट करने योग्य है कि प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने आजाद हिन्द फौज तथा आजाद हिन्द की अस्थायी सरकार की रजत जयंती के  अवसर पर अपने दो वरिष्ठ मंत्रियों को इस ऐतिहासिक स्थान पर भेजा और एक तरह देश की आजादी की लड़ाई में नेताजी के अविस्मरणीय योगदान को न सिर्फ रेखांकित किया बल्कि देशवासियों को उसका पुनर्स्मरण कराया।
इस परिसर में आईएनए वार म्यूजियम अर्थात आजाद हिन्द फौज युद्ध संग्रहालय भी अवस्थित है। संग्रहालय में नेताजी से संबंधित बहुत सारी सामग्रियों को प्रदर्शित किया गया है। उनके विभिन्न अवसरों पर लिए गए चित्र हैं, अखबारों की कतरनें हैं, आईएनए की यूनिफार्म और हथियार आदि हैं, उनके परिवार के सदस्यों के भी बहुत से चित्र हैं। एक चित्र नेताजी की इकलौती संतान अनिता बोस का भी है। वह चित्र भी है जिसमें नेताजी सैगॉन में विमान में चढ़ रहे हैं। यह उनके पार्थिव जीवन की आखिरी स्मृति है। बहुत से चित्र मणिपुर के उन नागरिकों के भी थे जो आजाद हिन्द फौज में शामिल हुए थे और बाद में अंग्रेज सरकार के कोपभाजन बने। ये सब सामान्यजन थे, फौजी नहीं लेकिन नेताजी के आह्वान पर देश को आजाद कराने की लड़ाई में कूद पड़े थे।
एक कक्ष में मणिपुर के पुराने राजा-महाराजाओं के चित्र थे। प्रदेश के राज्यपालों और मुख्यमंत्रियों के भी। मेरी निगाह इस कक्ष में तीन चित्रों वाले एक पैनल पर अटक गई। ये तीनों मणिपुरी साहित्य के शलाका पुरुष थे। महाकवि हिजाम अंगंगहाल, कवि चाओबा और कवि कमल। मणिपुरी साहित्य से मेरा परिचय लगभग शून्य है, लेकिन कवियों के चित्र देखकर प्रसन्नता हुई। संग्रहालय की सीढ़ियों से हम नीचे उतरे।  नेताजी की आदमकद मूर्ति को एक बार फिर सलाम किया। बारिश थम नहीं रही थी और इस भावुक अनुभव के बावजूद हमारा उत्साह कायम था। हम अगले पड़ाव की ओर निकल पड़े। लोकटाक झील के दर्शन जिस बिन्दु से करने थे वह पन्द्रह मिनट की दूरी पर था। यहां दो फर्लांग के करीब ऊपर चढ़ना था जहां से झील अपनी पूरी भव्यता के साथ दृष्टिगोचर होती है। मुझे लगा कि जिस सड़क से हम जा रहे हैं उसे झील के एक हिस्से को पाटकर ही बनाया गया है। यद्यपि इस बारे में मुझे सही जानकारी नहीं है।
लोकटाक अपने तरह की एक अनूठी झील है। इसका विस्तार दो सौ वर्ग किलोमीटर या उससे कुछ अधिक है और जलग्रहण क्षेत्र उससे पांच गुना याने एक हजार वर्ग किलोमीटर से ज्यादा है। यह पूर्वोत्तर भारत की संभवत: एकमात्र ताजे पानी की झील है और उसके बीच में बहुत सारे तैरते हुए द्वीप हैं। हम ऊपर जिस व्यू पाइंट पर थे वहां से झील तीन तरफ दिखाई दे रही थी और कुछ नन्हे द्वीप भी। इन द्वीपों पर अधिकतर मछुआरे रहते हैं और अपना जीवनयापन करते हैं। झील में खरपतवार बहुत है जिसकी बीच-बीच में सफाई चलते रहती है। हमें एक द्वीप और जाना था जहां मणिपुर का राज्य पशु संगाई पाया जाता है। यह हिरण की प्रजाति का पशु है। खराब मौसम के कारण स्टीमर चलना बंद थे अत: हम एक अनूठे अनुभव से वंचित रह गए। झील का विस्तार और उसका नीला जल आकर्षित करता है, किन्तु मुझे लगता है कि अगर ठीक से देखभाल नहीं की गई तो इसे नष्ट होने में ज्यादा समय नहीं लगेगा।
इस यात्रा वृत्तांत की अंतिम बात मणिपुर के व्यंजनों के बारे में। लोकटाक झील के नीचे ही हमारे स्वागत में मणिपुर की पारंपरिक रसोई की व्यवस्था की गई थी। थाली के आकार में गोल कटे केलों के पत्तों पर जिसमें एक बहुत तीखी मिलवां सब्जी थी। स्थानीय वनस्पतियों से बनी एक बारीक सी सलाद, सफेद भात, दाल और मटर के साथ काला भात और खीर, और न जाने क्या-क्या। हां! इस शाकाहारी भोजन में मछली भी थी जिसे मणिपुर और बंगाल में शाकाहारी ही माना जाता है।
देशबंधु में 11 जनवरी 2018 को प्रकाशित 

Wednesday, 3 January 2018

यात्रा वृतांत: मणिपुर : संस्कृति के कुछ रंग

                                         
पूर्वोत्तर भारत के इतिहास, भूगोल, संस्कृति इत्यादि के साथ शेष भारत का परिचय बहुत प्रगाढ़ नहीं है। दरअसल, अपार विविधता भरे इस देश में एक-दूसरे के बारे में जान लेना कठिन व्यायाम है। हम अमेरिका में तो हैं नहीं, जहां समूचे देश में लगभग एक जैसा खानपान, एक जैसे वस्त्राभूषण, एक जैसी सड़कें और एक जैसी इमारतें हों। अमेरिका में अटलांटिक तट से लेकर प्रशांत महासागर के किनारे तक चले जाइए; प्रकृतिदत्त विविधताओं को छोड़ दें तो मनुष्य ने जो निर्मित किया है उसमें बहुत फर्क दिखाई नहीं देता। खैर! यह तुलना न जाने कैसे दिमाग में आ गई, मैं बात तो अपने देश की करना चाह रहा था। मणिपुर के बारे में एक मिथक से हम परिचित हैं कि महाभारतकाल में अर्जुन ने वहां की राजकुमारी चित्रांगदा से गंधर्व विवाह रचाया था। वर्तमान समय की बात करने पर जो पहली और संभवत: एकमात्र छवि जनसामान्य में उभरती है वह मणिपुरी नृत्य की है। कोई कला-रसिक हो या न हो, मणिपुरी भारत की नृत्य परंपरा में एक प्रमुख शैली है यह लोग सामान्यत: जानते हैं।
मणिपुर का भारत की बहुलतावादी संस्कृति के विकास में जो दूसरा महत्वपूर्ण योगदान है वह संभवत: रंगमंच के क्षेत्र में है। रतन थियम देश के जाने-माने रंगकर्मी हैं। वे राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय याने एन.एस.डी. के निदेशक भी रह चुके हैं। देश की पूर्वी सीमा पर बसे इस प्रदेश का मैतेई समाज कृष्ण भक्तिधारा में डूबा हुआ है। यहां के एक राजा ने रासलीला प्रारंभ करवाई जिसे वे बृजभूमि से लेकर आए इसका संकेत हम पिछले लेख में दे चुके हैं। कोलकाता से हवाई यात्रा के दौरान ही यह अनुमान लग गया था कि मणिपुर में चैतन्य महाप्रभु द्वारा स्थापित गौड़ीय सम्प्रदाय का गहरा प्रभाव है। मैंने अपने कुछ सहयात्रियों को देखकर यह अनुमान लगाया था। मणिपुर के नृत्य और अन्य ललित कलाओं में भी यही प्रभाव परिलक्षित होता है। यहां तक कि पाककला में भी इसे देखा जा सकता है।
हमारे मेजबान साथी डॉ. नारा सिंह जी ने अपने प्रदेश की सांस्कृतिक परंपरा और इतिहास दोनों से हमें परिचित कराने का प्रबंध कर रखा था। एक शाम हमने लगभग डेढ़ घंटे लंबा कार्यक्रम देखा जिसमें नृत्य और गीत के अलावा मणिपुर के मार्शल आर्ट्स का प्रदर्शन भी शामिल था। औसतन पन्द्रह मिनट की एक-एक प्रस्तुति थी जिसमें कलाकारों की चपलता हाव-भाव, गायन, वादन सब कुछ देखते ही बनता था। जो प्रदर्शन तलवारबाजी के थे उनमें कलाकारों की चपलता और शरीर की लोच, अधर में फिरकी खाना आदि देखकर हम लोग ठगे से रह गए थे। तीसरी रात एक और सांस्कृतिक प्रस्तुति देखने का अवसर मिला। डॉ. नारा सिंह ने स्वयं पर्यावरण विनाश पर मणिपुरी में कविता लिखी है जिसका शीर्षक हिन्दी में 'प्रकृति का क्रंदन' होगा। इस पर आधारित एक घंटे से अधिक अवधि के बैले अथवा नृत्य नाटिका को देखना एक अद्भुत अनुभव था। 
यह कविता डॉ. नारा सिंह ने कई साल पहले लिखी थी। इसे उन्होंने विपक्ष के नेता के रूप में मणिपुर विधानसभा में सुनाया था। यहीं से उनका कवि मन भी जागृत हुआ। कविता पर आधारित बैले में लगभग पचास अभिनेता रहे होंगे जो मनुष्य द्वारा प्रकृति पर किए जा रहे अत्याचार के विभिन्न रूपों को अपनी कला से प्रदर्शित कर रहे थे। इस बैले का दृश्यविधान तो बहुत सुंदर था ही, कलाकार भी अपनी प्रतिभा की चमक बिखेर रहे थे। कार्यक्रम समाप्त हुआ। सारे लोग कलाकारों को बधाई देने उमड़ पड़े। बैले की निदेशिका लतादेवी थाउनाउजाम (यह सरनेम उनके गांव का नाम है) को बधाई देते हुए मैंने सहज पूछ लिया कि आपके हिन्दी उच्चारण इतने साफ कैसे हैं। जवाब मिला कि उन्होंने भोपाल में नाट्य कला का अध्ययन किया है और वे अपने समय की मशहूर रंगकर्मी गुल वर्द्धन व प्रभात गांगुली की छात्रा रहीं हैं। मैंने जब बताया कि मेरा भी मध्यप्रदेश से रिश्ता है तो वे एकाएक भावुक हो गईं। बोलीं- भोपाल तो मेरा मायका है, आप मेरे मायके से आए हैं।
मैं सात दिसंबर की सुबह मणिपुर पहुंचा था। उस दिन और अगली शाम तक भी मौसम खुला हुआ था। गो कि ठंड बहुत थी। अच्छे मौसम के कारण इम्फाल शहर में घूमने का अवसर मिल गया। इससे स्थानीय जीवन की कुछ और बातें समझ में आईं। मणिपुर में प्राकृतिक सुंदरता बहुत है। इम्फाल घाटी को छोड़कर अधिकतर प्रदेश पहाड़ों से घिरा हुआ है। नगा जनजाति की अधिकतर आबादी पहाड़ों में ही बसी है। मणिपुर को शेष भारत से जोड़ने वाले राष्ट्रीय राजमार्गों पर कभी भी नाकाबंदी कर देते हैं और तब स्थानीय जनता को बहुत सारी तकलीफों का सामना करना पड़ता है। याने यह प्राकृतिक सुंदरता कई बार परेशानी का सबब बन जाती है। दूसरी ओर मणिपुर कुछ मामलों में पूरी तरह से अन्य प्रदेशों की बराबरी करता है। जैसे वाहनों की बढ़ती संख्या, लगातार बढ़ता प्रदूषण, सीमेंट, कांक्रीट से बनते नए घर और ऊंची इमारतें, ट्रैफिक नियमों का पालन न करना, दलबदल, जोड़-तोड़ से बनी भाजपा सरकार के बावजूद स्वच्छता का अभाव इत्यादि।
इम्फाल, विष्णुपुर, मोइरांग जैसे नगरों को देखकर लगता है कि आप अपने घर में ही हैं। कम से कम सड़कों और बाजारों का नजारा तो वही है। मुझे अल्प प्रवास में यह भी अनुमान हुआ कि प्रदेश में बेरोजगारी काफी है और गरीबी भी कम नहीं है। एक जगह मैंने छोटा सा बाजार लगते देखा कुछ लोग हाथ ठेलों पर लादकर गठरियां लाए, उनको खोला और पुराने याने उतारे हुए ऊनी कपड़ों और जूतों की दुकानें सजा दीं। देखते ही देखते वहां ग्राहक इकट्ठा होने लगे। ऐसा दृश्य किसी भी भारतीय  नगर में आम है। मणिपुर के सब्जी बाजार में और इमा मार्केट में भी इस श्रेणी भेद को देख पाना बहुत कठिन तो नहीं था।
बहरहाल मणिपुर के बाजारों में दो-तीन नई बातें भी देखने मिलीं। इमा मार्केट में कमल के फूल, वे भी नीले और सुर्ख लाल बड़ी मात्रा में बिक्री होते देखे। इनका उपयोग ठाकुर की पूजा में होता होगा। गुवाहाटी की तरह यहां भी गुवा याने कच्ची सुपारी खूब बिकती है और खूब खाई भी जाती है। कच्ची सुपारी गाल के नीचे दबा ली जाए तो उससे एक मद्धिम किस्म का सुरूर चढ़ता है, यह तो मैंने भी अनुभव किया है। पुरुष ही नहीं, स्त्रियां भी इसका सेवन करती हैं। मणिपुर में खसखस बहुतायत में मिलती है। हमारे बंगाली दोस्त इसे देखकर बहुत प्रसन्न हुए क्योंकि बांग्ला भोजन में पोस्त याने खसखस का उपयोग काफी प्रचलित है। मैंने यहां काला चावल भी देखा और उसका दो रूपों में सेवन करने का अवसर भी मिला। काले चावल से बनी खीर बहुत स्वादिष्ट थी। अलग से भात की तरह खाने पर भी उसका स्वाद अच्छा था। यह भी एक रोचक संयोग था कि पश्चिमी सीमा पर फ़ाज़िल्का में जहां मैंने कुछ दिन पहले कीनू का स्वाद चखा था वहीं पूर्वी सीमा पर मणिपुर में स्थानीय संतरे का स्वाद लेने का अवसर मिला। प्रदेश में संतरे की खेती बढ़ाने के उपाय चल रहे हैं।
इन सारे स्वादों के साथ एक कड़वा स्वाद भी मिला। मणिपुर के अंग्रेजी अखबार पढ़कर यह समझ में आया कि देश के अन्य हिस्सों में जिस तरह प्रेस की स्वतंत्रता नाकाबिले बर्दाश्त हो गई है, कुछ वैसी ही परिस्थिति मणिपुर में भी बनी हुई है। मेेरे प्रवास के दौरान एक ऐसा प्रसंग आया जब सत्तारूढ़ भाजपा के प्रवक्ता ने टीवी पर प्रसारित किसी कार्यक्रम को लेकर पत्रकारों पर अवांछित टिप्पणी की जिसका विरोध स्थानीय पत्रकारों ने किया। उन्होंने बैठक आयोजित कर भाजपा प्रवक्ता के बयान की कड़ी निंदा भी की। स्वाधीनता संग्राम और मणिपुर के बारे में चर्चा तीसरी और आखिरी किश्त में होगी। 
देशबंधु में 04 जनवरी 2018 को प्रकाशित 

Wednesday, 27 December 2017

यात्रा वृतांत : मणिपुर : दो हजार साल पुराना किला!

                             

 इम्फाल शहर के बीच बाजार में एक चौक पर काले पत्थर की एक प्रतिमा स्थापित है। एक हाथी है और उसे साधने का प्रयत्न करता हुआ महावत है। मैंने आसपास के लोगों से पूछा किसकी प्रतिमा है, किन्तु सभी ने अनभिज्ञता प्रकट की। वहीं एक जन फुग्गे बेच रहा था। चेहरे मोहरे से पूर्वोत्तर का न होकर उत्तर भारतीय। नाम-धाम पूछने पर पुष्टि हुई कि बिहार का है। वह भी प्रतिमा के बारे में मेरी जिज्ञासा का समाधान नहीं कर पाया और न पास ही तैनात यातायात पुलिस का सिपाही। मैंने प्रतिमा की तस्वीर खींची, अपने होटल में तीन-चार लोगों को दिखाई। वे स्थानीय निवासी होने के बावजूद उससे अनभिज्ञ थे। अंतत: डॉ. नारा सिंह ने मुझे बताया कि यह मूर्ति एक बिगड़ैल हाथी और महाराजा भाग्यचंद्र द्वारा उसे साध लेने की कथा को वर्णित करती है। वे 1764 से 1768 तक मणिपुर के राजा थे। मणिपुर में कृष्ण चरित पर आधारित रासलीला प्रारंभ करने का श्रेय भी उन्हें जाता है। वे थे तो महाराजा, किन्तु उन्हें उनके उदात्त चरित्र के कारण राजर्षि की उपाधि मिली हुई थी।
मणिपुर के इतिहास की यह छोटी सी झलक पाकर अच्छा लगा, लेकिन अफसोस भी हुआ कि आज अधिकतर लोग ऐसे गुणी शासक के बारे में जानकारी नहीं रखते। प्रतिमा के नीचे कोई परिचय फलक भी नहीं था। मूर्ति के ठीक बाजू से एक फ्लाईओवर गुजरता है। हर आधुनिक नगर की यह अनिवार्य पहचान बन चुकी है। फ्लाईओवर के उस तरफ बसा है इमा मार्केट। मणिपुरी में मां को इमा कहते हैं। इस बाजार की ख्याति देश-विदेश में है। विशेषता यह है कि पूरा बाजार महिलाओं के हाथों में है। कोई एक हजार दूकानें हैं और उनका संचालन औरतें ही करती हैं। अधिकतर दूकानें साग-सब्जी, फल-फूल, किराना, बांस की टोकरियों आदि याने घर की दैनंदिन जरूरतों की हैं। कुछेक दूकानों पर मणिपुर के प्रसिद्ध ऊनी शाल व अन्य परिधान भी मिलते हैं। बाजार लगभग दस फुट ऊंचे आसन पर स्थित है। ऊपर छत है और आने-जाने के लिए अनेक जगहों पर सीढ़ियां बनी हैं। सारी दूकानें चबूतरों पर हैं जिनके बीच चलने के लिए संकरे गलियारे हैं।
मुझे इस बाजार में सबसे अधिक आकर्षण का केन्द्र वे मूर्तियां लगीं जो मुख्य द्वार से भीतर जाते साथ दाहिनी ओर स्थापित हैं। दो मूर्तियां स्लेटी पत्थर की हैं और कुछ पुरानी। उनकी आकृतियां भी अनगढ़ हैं। इनके बाजू में मणिपुरी वस्त्रों से सुसज्जित सुंदर भावभंगिमा वाली दो छोटी-छोटी मूर्तियां और हैं। इन दोनों मूर्ति युगलों की पूजा होती है और पत्र पुष्प चढ़ाए जाते हैं। आसपास की दूकानदार महिलाओं से जानना चाहा कि ये कौन हैं। उन्होंने मणिपुरी के साथ टूटी-फूटी हिन्दी-अंग्रेजी में जो उत्तर दिया वह पल्ले नहीं पड़ा। बाद में जानकारी मिली कि ये बाजार के रक्षक देवी-देवताओं की मूर्तियां हैं। एक तरह से क्षेत्रपाल। अनगढ़ मूर्तियां पुरानी हैं, लेकिन बाद में किसी कलाकार ने अपनी प्रतिभा का परिचय देते हुए बाजू में आकर्षक मूर्तियां बनाकर स्थापित कर दीं। इस बाजार में सौदा-सुलफ तो हर तरह का था और खरीदारी के साथ पर्यटकों की संख्या भी कम न थी; लेकिन मुझे यहां कोई खास बात प्रतीत नहीं हुई। मणिपुर के अन्य नगरों में व इम्फाल के अन्य बाजारों में भी सब तरफ महिलाएं ही दूकानों पर दिखीं। लेकिन अच्छा है कि मणिपुर ने इस बाजार  की मार्केटिंग भली प्रकार की है जिससे यह पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र बन गया है।
मैं मणिपुर अखिल भारतीय शांति एवं एकजुटता संगठन (एप्सो) की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में भाग लेने गया था। डॉ. नारा सिंह हमारे उपाध्यक्ष हैं। वे सीपीआई के नेता हैं। अनेक बार विधायक, दो बार मंत्री रह चुके हैं। पेशे से डॉक्टर हैं। विमानतल से होटल की ओर जाते हुए एक स्थान पर उन्होंने ध्यान आकृष्ट कराया। एक विशाल सिंहद्वार, उससे लगकर कोई आधा किलोमीटर तक सड़क के साथ चलती हुई चारदीवारी, बाहर पुराने जमाने की एक नहरनुमा खाई। नारा जी ने बताया यह प्राचीन कंगला फोर्ट है। सन् 0038 याने दो हजार साल पहले कंगला राजवंश ने इसे बनाया था। कभी मिट्टी का किला रहा होगा। फिलहाल वहां भीतर एक बगीचा और एक म्यूजियम मात्र है। अंग्रेजों के समय से यह असम राइफल्स के पास था। डॉ. मनमोहन सिंह ने अपने प्रधानमंत्री काल में सेना से इसे वापिस लेकर राज्य सरकार को सौंप दिया है। अब वनविभाग इसकी देखभाल करता है। मेरे लिए यह जानना रोचक था कि देश में मेवाड़ से भी पुराना कोई राजवंश और चित्तौड़ से भी पुराना कोई किला था।
मेरा विमान सात दिसम्बर की सुबह जब इम्फाल हवाई अड्डे पर उतर रहा था, तो यह देखकर सुकून मिला कि आसपास बहुमंजिलें भवन नहीं थे और चारों तरफ पहाड़ियां व हरियाली थी। यह राजधानी से आठ किलोमीटर दूर का नजारा था। शहर में खूब भीड़-भाड़ थी, वाहनों का शोर व धुआं था, बीच बाजार में तो पैदल चलना भी मुश्किल था। दूसरे दिन सुबह मैं होटल से बाहर घूमने निकला। कंगला फोर्ट का पश्चिमी द्वार आधा किलोमीटर से कुछ अधिक दूर था। वहीं एक चौराहा था। सुबह आठ बजे भी खासी गहमागहमी थी। मैं वापिस लौटने लगा तो देखा एक सिरे से बस कंपनियों के काउंटर बने हुए थे। इम्फाल से दीमापुर, कोहिमा, गुवाहाटी जाने के लिए बसें और मिनी बसें खड़ी थीं। इनके बीच खासी स्पर्धा होती होगी। म्यांमार की सीमा पर स्थित मोरे तक जाने के लिए भी बसें उपलब्ध थीं। आसपास चाय-नाश्ते के लिए छोटी-छोटी गुमटियां थीं और राईस होटलों के बोर्ड लगे थे जहां चावल और शोरबा ही मिल सकता था।
यहीं मेरी दृष्टि गन्ना रस के एक ठेले पर पड़ी। ठेलेवाले को देखकर अनुमान लगाया कि वह बिहार का होगा। अनुमान सही था। उमाशंकर बक्सर जिले का है। पिछले बीस साल से यहां रह रहा है। किसी परिचित के साथ आ गया था। पहले किसी दूकान पर नौकरी की मजदूरी भी, फिर किसी स्थानीय मित्र ने मदद की तो ठेला लगा लिया। पत्नी गांव में है, बच्चों को यहां साथ रखकर पढ़ा रहा है, कमाई ठीक-ठाक हो जाती है। मैं वापिस लौटा तो होटल के बाहर ही एक छोटा-मोटा बाजार नजर आया, वहां मुझे गन्ना रस बेचते हुए बिहार के सासाराम जिले के हरेराम मिल गए। वे चालीस साल से यहां हैं। बच्चे भी साथ में हैं। बड़े हो गए हैं, काम करते हैं। एक तो सीमा पर स्थित मोरे से सामान लाकर बेचता है। उसमें अच्छी कमाई हो जाती है। गांव में दो-चार बीघा जमीन भी खरीद ली है। हरेराम ने बताया कि इम्फाल में बिहार के कई हजार लोग काम कर रहे हैं। उन्हें कोई असुविधा नहीं है। अपना देश है, कहीं भी जाकर रोजी-रोटी कमा सकते हैं।
हम होटल इम्फाल में ठहरे थे। पहले यह पर्यटन विभाग का होटल था और ले-देकर चलता था। इसे बाद में निजी हाथों में सौंप दिया गया। यहां बरकत नामक युवा ने कमरे तक मेरा सामान पहुंचाया।  मैंने उसे सामान्य पोर्टर समझा था। बातचीत में मालूम हुआ कि वह राजनीतिशास्त्र में एम.ए. है। सरकारी नौकरी मिलना कठिन है इसलिए जो काम मिल गया, कर रहा है। पिता नहीं है, परिवार को चलाना है। बरकत ने बताया कि मणिपुर में अल्पसंख्यक तेरह-चौदह प्रतिशत हैं और वे स्थानीय निवासी ही हैं और उनका खान-पान व अधिकतर रीति रिवाज वैसे ही हैं जो अन्य जातीय समुदायों के हैं। वैसे मणिपुर में तीन जातीय समुदाय मुख्य हैं- मैतेई, कूकी और नगा। इनके बीच जातीय संघर्ष चलते रहते हैं। मैतेई वैष्णव हैं और मुस्लिम बाकी देश से न्यारे मणिपुरी मुस्लिम कहलाते हैं। वे इम्फाल घाटी में मुख्यत: रहते हैं। कूकी ईसाई हैं, उनका वास चूड़ाचांदपुर (चूड़ाचांद भी एक महाराजा थे) और उसके आसपास के पहाड़ी क्षेत्र में है। नगा भी पहाड़ी क्षेत्र के ही निवासी हैं।
इस समय मणिपुर में सबसे बड़ी राजनीतिक चिंता वर्तमान केन्द्र सरकार द्वारा किए गए गुप्त नगा समझौते को लेकर है। किसी को नहीं पता कि इसमें क्या है। वे चिंतित हैं कि भारत सरकार कहीं नगा समुदाय के सामने झुककर नगालिम याने वृहतर नगालैंड की मांग स्वीकार न कर ले जिसमें मणिपुर से कुछ जिले भी उनको दे दिए जाने का प्रस्ताव है। प्रदेश में जोड़-तोड़ से बनी भाजपा सरकार है और वह नागरिकों को हर तरह से आश्वस्त करने में लगी है कि मणिपुर की क्षेत्रीय अखंडता के साथ कोई समझौता नहीं किया जाएगा। गृह मंत्री राजनाथ सिंह भी ऐसा आश्वासन दे चुके हैं। लेकिन जनता को इन पर विश्वास नहीं हो रहा है।
देशबंधु में 28 दिसंबर 2017 को प्रकाशित 

Wednesday, 20 December 2017

यात्रा वृतांत: फ़ाज़िल्का की हवेली

                                             

 यह कल्पना करना कठिन नहीं है कि 1966 में और फिर 1968 में जब मैं दुबारा वहां गया तब फ़ाज़िल्का एक बड़े कस्बे जैसी जगह रही होगी। विगत पचास वर्षों में देश के हर शहर और हर गांव का नक्शा बदला है, तो पश्चिमी सीमा पर बसा यह नगर भी उस बदलाव से अछूता कैसे रहता! प्रसंगवश मुझे ध्यान आता है कि मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले में पिपरिया के पास बनखेड़ी एक साधारण गांव था। दो-तीन साल पहले वहां से गुजरा तो देखा रेल लाइन के पास नई बनखेड़ी के नाम से एक समानांतर बसाहट कायम हो गई है। इसी तरह कुछ वर्ष पूर्व कवर्धा से राजनांदगांव के लिए देर शाम निकला तो रास्ते में सहसपुर लोहारा की जगमगाहट देखकर आश्चर्य में पड़ गया। जो गांव पहले सड़क से काफी भीतर हुआ करते थे अब वे सड़क किनारे आ गए हैं और सड़क किनारे के खेतों की जगह बड़े-छोटे मकान तन गए हैं। यह बदलाव हम रायपुर में भी तो देख रहे हैं जहां क्रमश: रायपुर, पुरानी बस्ती, बूढ़ापारा से शंकरनगर, अनुपम नगर होते हुए अब एक नए शहर के रूप में नया रायपुर विकसित हो रहा है।
फ़ाज़िल्का पिछली दो बार की तरह इस बार भी हम एक वैवाहिक कार्यक्रम में शरीक होने ही गए थे। आत्मीय परिजन रमेश जिनके बेटे का विवाह था, उन्होंने हम कुछ लोगों के ठहरने की व्यवस्था हाल-हाल में खुले एक नए होटल में की थी। यह होटल एक नई सड़क पर था जिसका नाम भी न्यू अबोहर रोड था। उस पर एक फ्लाईओवर भी बन गया था। इस रोड पर हमारे होटल के आगे कोई आधा दर्जन नई शैली के विवाह मंडप बन गए थे। उनकी भव्यता चकित करने वाली थी। इनमें सौ-सौ गाड़ियां खड़ी हो जाएं, इतनी बड़ी पार्किंग व्यवस्था थी। ठंड के दिन हैं तो हाल में भोजन व्यवस्था और वह भी ऐसी कि एक बार में चार-पांच सौ लोग साथ-साथ खड़खाना (बूफे को यह नाम मराठी के प्रसिद्ध व्यंग्य लेखक गंगाधर गाडगिल का दिया हुआ है) का आनंद ले सकें। रायपुर जैसे बड़े शहर में ऐसी व्यवस्था हो तो किसी को आश्चर्य नहीं होगा। पंजाब के सीमावर्ती नगर में भी अगर ऐसा ही सरंजाम था तो शायद इसका श्रेय पंजाबी समाज की उत्सवप्रियता को दिया जा सकता है। सामान्यत: विवाह में भोजन शाकाहारी ही होता है, लेकिन यदि विवाह मंडप में मद्यपान की व्यवस्था भी हो तो इसे उनकी उत्सव मनाने की परंपरा का अंग मानना चाहिए।
एक तरफ विकसित होता हुआ नया इलाका और दूसरी ओर नगर की पुरानी बसाहट। फ़ाज़िल्का और आसपास का क्षेत्र कपास उत्पादन के लिए प्रसिद्ध रहा है। यहां के कपास की बिक्री मुख्यत: लगभग पचास किलोमीटर दूर अबोहर में होती थी इसलिए आज भी अबोहर के साथ मंडी प्रत्यय जुड़ा हुआ है। जबकि फ़ाज़िल्का को स्थानीय लोग आपस में नगर कहकर पुकारते हैं। यह पर्यायवाची कैसे प्रचलित हुआ मैं नहीं जान पाया, लेकिन अनुमान लगाता हूं कि कपास नकदी फसल है, यहां के किसान पहले से ही समृद्ध रहे हैं, उसके अनुरूप यहां नागरिक सुविधाएं विकसित हुई होंगी और नगर का विशेषण इसीलिए मिल गया होगा। मेरा यह अनुमान दो-ढाई दिन के प्रवास में पुष्ट हुआ। जब हम पहुंचे तो भाई रमेश ने कुछ अफसोस जताते हुए कहा कि मैं तो आपको हवेली में ठहराना चाहता था, लेकिन आप वहां अकेले न पड़ जाएं इसलिए होटल में आपकी व्यवस्था की है। मैं यह सुनकर ही चौंक गया कि यहां ऐसी कौन सी हवेली है! 
शहर के पुराने हिस्से में बीच बाजार एक संकरी गली में जब हवेली देखी तो आश्चर्य के साथ-साथ प्रसन्नता भी बहुत हुई। मुझे तो जैसे एक नायाब खजाना हाथ लग गया। इतिहास, पुरातत्व, विरासत स्थल इन सब में मुझे गहरी रुचि है इसलिए यह प्रसन्नता हुई। यह हवेली सन् 1845 में बनी थी याने आज से लगभग पौने दो सौ साल पहले। राजस्थान में बीकानेर के पास किसी छोटे गांव से निकलकर सूरतगढ़, श्रीगंगानगर होते हुए माहेश्वरी समाज से संबंधित एक पेड़ीवाल परिवार सन् 1841 में यहां व्यापार के सिलसिले में आकर बसा था। चार साल के भीतर उन्होंने अपने रहने के लिए यह हवेली बनवाई थी। इसमें कालांतर में परिवर्तन भी हुए, कुछ नया निर्माण भी हुआ और परिवार बढ़ने के साथ-साथ आगे चलकर विभाजन भी हुआ। हवेली का जो भाग हमने देखा उससे लगे हुए उसी परिवार के दो अन्य रिहायशी भवन भी हैं इन्हें देखते हुए मुझे जबलपुर में राजा गोकुलदास महल, जिसे बखरी के नाम से जाना जाता है, का ध्यान आ गया। यह हवेली उस बखरी का एक लघुरूप ही मुझे प्रतीत हुई।
सुशील पेड़ीवाल हवेली के वर्तमान मालिक हैं। उन्होंने अपने दादा रायसाहब शोपतराय पेड़ीवाल की स्मृति में इसका नामकरण किया है। पेड़ीवाल परिवार का पिछले डेढ़ सौ साल से व्यापार जगत में नाम है ही, उन्होंने जिस जगह आकर भौतिक समृद्धि अर्जित की, उस मिट्टी के प्रति अपना कर्ज उतारने के भी उपक्रम किए। सौ साल से अधिक पुराने सिविल अस्पताल का जनाना वार्ड इसी परिवार ने बनवाया, जलप्रदाय व्यवस्था भी की और बाजार चौक में घंटाघर का निर्माण भी करवाया। इनकी तीन-चार पीढ़ियां भी स्थानीय नगरपालिका में अध्यक्ष पद पर काबिज रहीं। घंटाघर हवेली से कोई आधा फर्लांग की दूरी पर है। उसका रख-रखाव आज भी सुशील पेड़ीवाल के सहयोग से होता है। इसका निर्माण हुए भी सौ साल से ऊपर हो गए हैं और इस नाते इसकी गणना भी विरासत स्थल के रूप में होने योग्य है।
बहरहाल हवेली की बात करें। यह एक खूबसूरत आवासीय भवन है, जिससे हमें आज से दो सौ साल पहले की अपने देश की भवन निर्माण कला और कौशल का परिचय मिलता है। इसमें दरवाजों पर की गई नक्काशी बेहद खूबसूरत है। पुराने चित्र और भित्तिचित्र हैं। वे उस दौर के कलाकारों की प्रतिभा को दर्शाते हैं। भवन के बीच में खुला आंगन है जैसे कि पहले के अधिकतर मकान हुआ करते थे। खुले आंगन के कारण तापमान को संतुलित करने में मदद मिलती है। एक रोचक बिन्दु ध्यान में आया कि भूतल पर सीढ़ी के बाजू में एक चार फुट ऊंची और एक बड़ी टेबल के आकार की मोटी सी लोहे की तिजोरी है, लेकिन सुशीलजी ने बताया कि यह सिर्फ तिजोरी का दरवाजा है। इसका ढक्कन खोलने पर नीचे जाने के लिए सीढ़ियां हैं। नीचे उस तलघर में कभी वजन से तौलकर थैली  में बांधकर चांदी के सिक्के जमा कर दिए जाते थे। कुछ अन्य कमरों में भी तिजोरियां रखी हुई हैं वे भी इंग्लैंड की बनी। इन पर भारी-भरकम ताले लगे हुए हैं जिन्हें छोटा-मोटा चोर तो नहीं खोल सकता।
सुशीलजी ने हवेली का थोड़ा कायाकल्प किया है। हाल के वर्षों में अनेक पूर्व राजाओं ने अपने महलों को हैरिटेज होटल में तब्दील कर दिया है। हवेली को होटल तो नहीं बनाया गया है, लेकिन इतनी व्यवस्था अवश्य है कि विदेशी पर्यटक या खास मेहमान आएं तो उन्हें यहां आराम के साथ ठहराया जा सके। सुशील पेड़ीवाल कलात्मक रुचि सम्पन्न हैं। उन्होंने हवेली की शोभा बढ़ाने के लिए देश के अनेक स्थानों से हस्तशिल्प लाकर इस स्थान को अलंकृत कर दिया है। यहां भित्तिचित्र, नक्काशी, पेटिंग्स और अन्य कलाकृतियों को अगर इत्मीनान के साथ देखना चाहें तो एक पूरा दिन तो लग ही जाएगा। बहरहाल मुझे अच्छा लगा कि सुशीलजी न सिर्फ अपने पूर्वजों द्वारा छोड़ी गई संपत्ति की देखभाल कर रहे हैं बल्कि वे देश की लगभग दो सदी पुरानी कलाकारी और कारीगरी का भी संरक्षण कर रहे हैं। 
वे हमें हवेली दिखा रहे थे। बातचीत में मालूम हुआ कि पास के किसी गांव में उनका कृषि फार्म भी है। वे हमें वहां भी ले गए। जहां हमने आधुनिक तकनीक से खेती और बागवानी होते देखी। जिस पॉली हाउस पद्घति को सामान्य तौर पर किसानों के लिए घाटे का सौदा माना जाता है, वहीं सुशील पेड़ीवाल पॉली हाउस में टमाटर और अन्य सब्जियों की फसलें ले रहे हैं। उन्होंने एक सिरे से जामुन के सौ-दो सौ पेड़ लगाए हैं जिससे भी वे संतोषजनक आमदनी कर लेते हैं। कीनू के ग्यारह सौ पेड़ उन्होंने लगाए हैं, जिनकी बल्कि पूरे फार्म की मॉनीटरिंग सीसी टीवी से होती हैं। इस तरह एक ओर हमने फ़ाज़िल्का की विरासत से परिचय पाया, वहीं दूसरी ओर आधुनिक और उन्नत कृषि का भी एक मॉडल देखा। इस वृतांत को समाप्त करने से पहले दो-एक छोटी-छोटी बातें और। हरियाणा में सारे साइन बोर्ड देवनागरी में, पंजाब में सिर्फ गुरुमुखी में।
फ़ाज़िल्का के पुराने बाजार में ही हिन्दी के साइन बोर्ड दिखे। चार सौ किलोमीटर के रास्ते में जो भी अच्छे-बुरे ढाबे थे वे सब के सब 'शाकाहारी वैष्णो ढाबा' थे। कुछ गांवों के नाम दिलचस्प थे जैसे बहू अकबरपुर और अबुल खुराना। आखिरी बात, आप कभी इस रास्ते पर जाएं तो हिसार के पास हांसी के पेड़े और दूध की दूसरी मिठाइयों का स्वाद लेना न भूलें।
देशबंधु में 21 दिसंबर 2016 को प्रकाशित 

Wednesday, 13 December 2017

यात्रा वृतांत : पश्चिमी सीमांत की ओर


 पूर्वी दिल्ली में यमुनापार बेटी तिथि के घर से निकलकर रोहतक रोड पर पीरागढ़ी चौक तक पहुंचने में ही एक घंटा लग गया। इसके बाद आधा घंटा बहादुरगढ़ चौक तक पहुंचने में लगा जहां से हमें देश की पश्चिमी सीमा तक जाने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग पर चलना था। गूगल का नक्शा बता रहा था कि घर से फ़ाज़िल्का पहुंचने में आठ घंटे लगेंगे। हमने सोचा था नाश्ता करके आराम से नौ बजे निकलेंगे और पांच बजे गंतव्य तक पहुंच जाएंगे। अगर वैसा करते तो दिल्ली पार करने में ही ढाई-तीन घंटे निकल जाते। अजय की सलाह मानकर साढ़े सात बजे निकले तो सड़कों पर यातायात का दबाव अपेक्षाकृत कम था और हम आठ-साढ़े आठ घंटे में सफर तय कर सके। लौटते समय अवश्य मुसीबत हुई। दिल्ली में प्रवेश करते हुए पांच बज चुके थे और कम टै्रफिक वाले एक लंबे रास्ते पर चलकर घर पहुंचने में दो घंटे से अधिक वक्त लग गया। इतनी मैट्रो, इतनी बसें, इतने फ्लाईओवर, फिर भी दिल्ली में यातायात के हाल बेहाल हैं और उसके चलते जो प्रदूषण बढ़ रहा है उससे भी दिल्लीवासी त्रस्त हैं।
बहरहाल हम जा रहे थे फ़ाज़िल्का। इक्यावन साल पहले पहली बार इस सीमांत नगर में आने का मौका मिला था। बुआजी के बेटे अनुपम भैया की बारात में। यह अप्रैल 1966 की बात है। 1965 के भारत-पाक युद्ध को बीते बमुश्किल छह माह ही हुए थे। सारे बाराती नगर से लगभग तेरह किलोमीटर दूर बार्डर तक गए थे। न कांटेदार तार और न कोई दीवार। बस इस पार और उस पार साधारण सी चेकपोस्ट बनी थीं। पाकिस्तानी सिपाहियों ने भी हम लोगों का अभिवादन किया था कि आप हमारे गांव की बेटी लेने आए हैं। इन पांच दशकों में बहुत कुछ बदल गया है। अब जैसे वाघा बार्डर पर शाम की परेड होती है उसी का लघु संस्करण फ़ाज़िल्का बार्डर पर भी देखने मिलता है। दोनों तरफ दर्शक दीर्घा भी बन गई हैं। इसी तरह का एक दृश्य तीन एक साल पहले फिरोजपुर के पास हुसैनीवाला बार्डर पर देखा था। वाघा चूंकि अमृतसर के निकट है इसलिए वहां काफी गहमागहमी रहती है। हुसैनीवाला और फ़ाज़िल्का में हम जैसे भूले-भटके  पर्यटक परेड का नजारा देखने आ जाते हैं।
दिल्ली से फ़ाज़िल्का के कुछ पहले मलौट नगर तक राष्ट्रीय राजमार्ग-9 चलता है। इसे अगर मैं वीवीआईपी राजमार्ग की संज्ञा दूं तो अतिशयोक्ति न होगी। बहादुरगढ़ चौक पार करने के बाद महम पड़ता है। यह आधुनिक हरियाणा के निर्माता बंशीलाल का नगर है। बंशीलाल ही थे जिन्होंने हरियाणा को देश में सबसे पहले पूर्ण विद्युतीकृत राज्य बनाने का काम किया था। यही बंशीलाल थे जो आगे चलकर आपातकाल की ज्यादतियों के लिए अपयश के भागीदार बने थे। महम से आगे बढ़ो तो हिसार आता है। यह भजनलाल का चुनाव क्षेत्र है। ओ.पी. जिंदल और उनके बेटे यहीं से आगे बढ़े हैं। सावित्री देवी जिंदल भारत की सबसे धनी महिला मानी जाती हैं। भजनलाल और जिंदल को पीछे छोड़ते हुए थोड़ी देर बाद हम अग्रोहा से गुजरते हैं जो अग्रवाल समाज के लिए एक तीर्थ का रूप ले चुका है। इसके बाद आता है सिरसा। पाठकों को ध्यान होगा कि गुरमत रामरहीम के कारण यह नगर हाल के दिनों में सुर्खियों में आ चुका है। हरियाणा के एक और पूर्व मुख्यमंत्री जिन्हें देश का उपप्रधानमंत्री बनने का सौभाग्य मिला, उन चौधरी देवीलाल का गांव चौटाला सिरसा से बहुत दूर नहीं है। ताऊ के पुत्र ओमप्रकाश चौटाला भी मुख्यमंत्री रह चुके हैं।
अभी तक हम हरियाणा में हैं। कुछ किलोमीटर आगे मंडी डबवाली है। यहां बीस वर्ष पूर्व 23 दिसम्बर 1996 को भीषण अग्निकांड में कई लोगों की मौत हो गई थी। इस नगर की खासियत है कि आधा शहर हरियाणा में और आधा पंजाब में पड़ता है। रेलवे स्टेशन शायद पंजाब में है। पंजाब के बुजुर्ग नेता और पांच बार मुख्यमंत्री रहे प्रकाशसिंह बादल का गांव बादल  तथा विधानसभा क्षेत्र लांबी भी इसी सड़क पर है। इस तरह लगभग तीन सौ किलोमीटर के भीतर हम एक उपप्रधानमंत्री, आधा दर्जन मुख्यमंत्री और लगभग उतने ही सांसदों के गांवों से गुजरते हैं। इन सबने भारत की राजनीति-वाणिज्य, व्यापार और धर्म-आध्यात्म को अपनी-अपनी तरह से प्रभावित किया है। ... तो हुआ न यह वीवीआईपी रोड !
फ़ाज़िल्का की ओर जाते समय बहादुरगढ़ के पास एक बेहतरीन ढाबा मिल गया था। सोचा था कि दोपहर का भोजन आगे चलकर ऐसे ही किसी अच्छी जगह पर कर लेंगे। पंजाब-हरियाणा की सड़कें तो अच्छी हैं ही, वहां रास्ते में ढाबे भी बहुत अच्छे हैं, यह हमने सुन रखा था। लेकिन आश्चर्य की बात कि पूरे रास्ते हमें कहीं भी भोजनालय तो क्या, चाय की दूकान भी ठीक-ठाक नहीं मिली। गनीमत थी कि साथ में रोटी-सब्जी लेकर चले थे। मंडी डबवाली में टैक्सी को पंजाब का रोड टैक्स पटाना था, चौकी पर तैनात कर्मचारी कहीं गया हुआ था; उसके इंतजार में गाड़ी में वहीं बैठे-बैठे हमने टिफिन खोलकर भोजन कर लिया। इस बीच मोबाइल पर एसएमएस आया- पंजाब में आपका स्वागत है। कोई दिक्कत हो तो डिप्टी चीफ मिनिस्टर से फलाने नंबर पर बात कीजिए। मैं फोन लगाने ही वाला था कि आरटीओ का कर्मचारी लौट आया और शिकायत करने की नौबत नहीं आई। 
हरियाणा-पंजाब दोनों में पहले गेहूं बहुत होता था, बाद में बड़े पैमाने पर धान की फसल किसान लेने लगे। रास्ते के दोनों तरफ खेतों में धान कट चुकी थी। अनेक स्थानों पर गन्ने की फसल लहलहाती हुई मिली। दो-तीन जगह शक्कर कारखाने भी नज़र आए। अनेक स्थानों पर नहर से आबपाशी की सुविधा है, लेकिन अधिकतर खेतों में ट्यूबवेल लगे हुए देखे। सड़क के दोनों किनारों पर कांस की ऊंची-ऊंची झाड़ियां यहां से वहां तक देखने मिलीं, और साथ-साथ बबूल और महारुख के पेड़। आम के वृक्ष कहीं-कहीं ही दिखे। रोहतक बहादुरगढ़ के बीच कुछेक अमरूद याने बिही के बगीचे थे और सड़क किनारे अमरूद की ढेरियां बिक्री के लिए लगी हुई थीं। उधर लांबी के आसपास कीनू के उद्यान भी कहीं-कहीं दिखे। कीनू एक तरह का संतरा ही है जो इधर लोकप्रिय होने लगा है। हरियाणा और पंजाब का मैदानी इलाका इस तरह एक अलग ही दृश्यावली प्रस्तुत करता है। दूर-दूर तक फैले खेत, उनके बीच में कीकर याने बबूल के वृक्ष, फसल कट जाए तो मिट्टी का धूसर रंग, लेकिन उसी में जब सरसों फूलने लगे तो एक नई तरह की छटा।
मैं यह सोच-सोच कर परेशान था कि इस रास्ते पर खाना छोड़, चाय तक क्यों नहीं मिल रही है। सिरसा बस्ती में कुछ अच्छे रेस्तरां हैं, ऐसा गूगल पर आ रहा था, लेकिन हम बायपास से गुजर रहे थे और वहां कुछ भी नहीं था। मंडी डबवाली भी खासी बड़ी बस्ती है, लेकिन वहां हमें सिर्फ मोटर पार्ट्स की दूकानें और मोटर गैरेज ही दिखाई दे रहे थे। कुछेक स्थानों पर बड़े-बड़े मैरिज गार्डन और मैरिज पैलेस दिखाई दिए, लेकिन वहां भी चाय मिलने की कोई उम्मीद नहीं थी। हिसार में विश्वविद्यालय है, कृषि और पशुपालन से संबंधित केन्द्र सरकार के संस्थान हैं लेकिन वहां भी बायपास पर कुछ नहीं था। लौटते समय सिरसा के पास एक छोटे से होटल में रुके तो उस होटल के मालिक ने मेरी शंका का समाधान किया। यह सड़क बार्डर तक जाती है। यहां टूरिस्टों का कोई खास आना-जाना नहीं है इसलिए यहां होटल-ढाबे नहीं चलते। बाकी जो स्थानीय लोग हैं वे घंटे-दो घंटे में अपने ठिकाने पहुंच ही जाते हैं। उन्हें रास्ते में रुकने की जरूरत ही नहीं।
हम जब दिल्ली से रवाना हुए थे तो महानगर के पश्चिमी छोर पर एक स्थान पड़ा हिरणकूदनी। श्रीमतीजी ने उस ओर ध्यान  आकृष्ट किया। मन में विचार उठा कि यह नाम इसीलिए पड़ा होगा कि कभी यहां हिरणों का वास रहा होगा! आज भी दिल्ली-गुड़गांव के बीच कहीं-कहीं मोर देखने मिल जाते हैं। इधर हिरण रहते होगें, लेकिन दिल्ली के विस्तार ने सबको लील लिया है।  दिल्ली में जब मेट्रो प्रारंभ हुई, तो पश्चिमी दिशा में मुंडका उसका आखिरी स्टेशन था, वहां दिल्ली मेट्रो कार्पोरेशन का बहुत बड़ा कई एकड़ में फैला यार्ड है; लेकिन अब हरियाणा में बहादुरगढ़ तक मेट्रो बिछ रही है और वहां भी एक बड़ा मेट्रो यार्ड बन रहा है। हिरणों का कूदना अब सिर्फ स्मृतियों में बचा रहेगा। 
देशबंधु में 14 दिसंबर 2017 को प्रकाशित 

Monday, 11 December 2017

डॉ. रमन के चौदह साल

                                        
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने अपने कार्यकाल के चौदह वर्ष पूरे कर लिए हैं। अविभाजित मध्यप्रदेश के राजनैतिक इतिहास में इस तरह उन्होंने एक रिकार्ड अपने नाम कर लिया है। 1985 में जब अर्जुन सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस ने लगातार दूसरा चुनाव जीता तो वह इस तरह का पहला रिकार्ड था। दूसरा रिकार्ड कायम किया दिग्विजय सिंह ने जो 1993 से 2003 तक लगातार  दस साल मुख्यमंत्री रहे। मध्यप्रदेश में उमा भारती और बाबूलाल गौर के बाद शिवराज सिंह चौहान मुख्यमंत्री बने, उन्होंने ग्यारह वर्ष से अधिक समय तक पद पर रहकर दिग्विजय सिंह का रिकार्ड तोड़ दिया। वैसे पुराने मध्यप्रदेश में, जिसे सीपी और बरार के नाम से जाना जाता था, पंडित रविशंकर शुक्ल 1947 से 1956 तक लगातार मुख्यमंत्री रहे थे। यह तो हुई प्रदेश की बात। राष्ट्रीय परिदृश्य पर नज़र दौड़ाएं तो पाते हैं कि सिक्किम के मुख्यमंत्री पवन कुमार चामलिंग सर्वाधिक लंबी अवधि तक रहने वाले मुख्यमंत्री बन गए हैं। देश में सबसे पहले मोहनलाल सुखाडिय़ा ने राजस्थान के मुख्यमंत्री के रूप में सत्रह साल लंबी पारी खेलने का रिकार्ड बनाया था। पश्चिम बंगाल में ज्योति बसु ने उस रिकार्ड को तोड़ा। वे तेईस साल मुख्यमंत्री रहे। सिक्किम के चामलिंग अपनी पांचवी पारी के आखिरी चरण में हैं। उड़ीसा में नवीन पटनायक  चौथी पारी के अठारह साल पूरे कर चुके हैं। इस तरह वर्तमान समय में डॉ. रमन सिंह कीर्तिमान बनाने की दृष्टि से तीसरे क्रम पर हैं।
छत्तीसगढ़ में अगले साल विधानसभा चुनाव होंगे तब तक डॉ. रमन सिंह के कार्यकाल को पन्द्रह वर्ष पूरे हो जाएंगे। यह देखना दिलचस्प है कि उनको पद से हटाए जाने की अफवाहें लगातार उड़ाई जाती हैं जो अंतत: झूठी सिद्ध होती हैं, फिर भी यह सिलसिला रुकता नहीं है। इसलिए स्वाभाविक ही यह अनुमान लगाया जा सकता है कि भाजपा 2018 के चुनाव भी डॉ. रमन सिंह के नेतृत्व में लड़ेगी। दूसरे शब्दों में पार्टी के भीतर जो उनके विरोधी हैं उनकी डॉ. रमन सिंह को केन्द्र में भिजवाने या मुख्यमंत्री पद से हटाने की कोशिशें फलीभूत होने की कोई संभावना फिलहाल नज़र नहीं आती। आज राजनीति के क्षेत्र में जिस तरह का घमासान मचा हुआ है उसे देखते हुए यह प्रश्न मन में उठता है कि डॉ. रमन सिंह इतने लंबे समय तक कैसे अपनी कुर्सी को संभालकर रख पाए! अपनी सीमित जानकारी के आधार पर मैं कुछ अनुमान लगाता हूं। डॉ. रमन सिंह केन्द्र में राज्यमंत्री थे। अपना काम भलीभांति कर रहे थे। लालकृष्ण आडवाणी के निर्देश पर मंत्री पद की सुख-सुविधा छोड़कर वे पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष का काम संभालने रायपुर आ गए। ऐसा करके उन्होंने पार्टी के प्रति निष्ठा का परिचय दिया जिससे निश्चय ही भाजपा और संघ के कर्णधारों के बीच वे सराहना और विश्वास के पात्र बने। फिर जिस छत्तीसगढ़ को कांग्रेस का गढ़ माना जाता था उसको उन्होंने एक साल के भीतर ही ध्वस्त कर 2003 के आम चुनावों में आशातीत सफलता प्राप्त की जिसके कारण उनकी संगठन क्षमता और नेतृत्व क्षमता की धाक भी पार्टी व संघ के भीतर जमी होगी। यह तथ्य भी रेखांकित करने योग्य है कि 2004 से 2014 के बीच केन्द्र सरकार के जितने भी मंत्री छत्तीसगढ़ आए वे सब डॉ. रमन की सराहना करके ही लौटे। यह अपने आप में आश्चर्य की बात थी। भाजपा के जो बड़े नेता, प्रदेश प्रभारी आदि भी जब-जब यहां आए तो रमन सिंह से प्रसन्न होकर ही लौटे। अर्थात रमन सिंह मित्रों और विरोधियों दोनों को संतुष्ट रखने की कला मेें निष्णात हैं।
मैंने डॉ. रमन सिंह को जितना देखा है उसमें एक-दो बातें उल्लेख करने योग्य लगती हैं। एक तो उन्हें अगर पर्याप्त समय मिले तो वे किसी भी विषय पर पूरी तैयारी करके ही निष्कर्ष पर पहुंचते हैं अथवा निर्णय लेते हैं। वे जब केन्द्र में मंत्री थे तब अपने वरिष्ठ मंत्री मुरासोली मारन की बीमारी के चलते उन्हें लोकसभा में अपने विभाग के बारे में जवाब देना पड़ते थे। वे पूरी तैयारी करके प्रभावशाली तथा संतोषजनक रूप से उत्तर देते थे। मेरा कयास है कि मुख्यमंत्री बनने के बाद उनके पास इतना समय नहीं होता कि वे हर विषय पर पूरी तैयारी कर पाएं। मैंने यह भी अक्सर नोट किया है कि वे सुनते अधिक और बोलते कम हैं। यह गुण अर्जुन सिंह में भरपूर था। डॉ. रमन अपने विरोधियों पर उनका नाम लिए बिना उन पर कटाक्ष करना या आलोचना करना बखूबी जानते हैं। यद्यपि इधर साल-दो साल से वे इस ओर कुछ असावधान हो गए प्रतीत होते हैं। रमन सिंह मेहनत भी बहुत करते हैं। अप्रैल-मई की चिलचिलाती धूप में गांव-गांव घूमना, उनके ही बस की बात है। मैं यह भी कहना चाहूंगा कि उनके सामने कोई भी आए, वे उसे अपने व्यवहार से पल-दो पल में जीत लेते हैं। इसीलिए उनके विरोधी भी निजी तौर पर उनकी आलोचना करने का अवसर मुश्किल से ही खोज पाते हैं।
एक लंबे समय तक मुख्यमंत्री बने रहने का कीर्तिमान बनाना एक बात है, लेकिन उसके साथ यह सवाल तो उठता ही है कि इस लंबे कार्यकाल की उपलब्धियां क्या हैं? डॉ. रमन सिंह को कुछ बातों का श्रेय अवश्य देना होगा। मेरी याददाश्त में वे देश में पहले मुख्यमंत्री थे जिसने किसानों के लिए ऋण पर ब्याज दर बारह प्रतिशत से घटाकर छह प्रतिशत और बाद में शायद तीन प्रतिशत कर दी। इसके अलावा उन्होंने तमिलनाडु के उदाहरण से प्रेरणा लेते हुए एक रुपया किलो चावल की योजना प्रारंभ की। वह भी एक महत्वपूर्ण निर्णय था। उन्होंने महेन्द्र कर्मा को सामने रख सलवा जुड़ूम की शुरूआत की थी। यदि वह नक्सलियों के विरुद्ध आदिवासियों की अपनी पहल बन पाती तो शायद उसके कुछ अच्छे परिणाम सामने आते! लेकिन हम जानते हैं कि सलवा जुड़ूम का अंतत: क्या हुआ। रमन सरकार के एक और सही निर्णय का मुझे ध्यान आता है जब उसने वन अधिकार कानून के अंतर्गत हजारों आदिवासियों पर चल रहे मुकदमे खत्म करने की घोषणा की थी। प्रदेश में स्कूली शिक्षा के लिए नियुक्त शिक्षाकर्मियों का पदनाम बदलकर पंचायत शिक्षक करने और उन्हें किसी हद तक सम्मानजनक वेतन देने की पहल भी स्वागत योग्य थी। इनके अलावा और बहुत से कार्यक्रम और योजनाएं हैं जिनका श्रेय सरकार लेती है। इनमें से अनेक योजनाएं केन्द्र प्रवर्तित हैं जिसके लिए धनराशि केन्द्र से आती हैं।  दूसरे सरकार की आमदनी में भी साल दर साल इजाफा हो रहा है, उसके कारण भी बहुत से विकास कार्य होते दिखाई दे रहे हैं। किसी भी कल्याणकारी राज्य में सड़क, बिजली, पानी के काम तो स्वाभाविक गति से तो होना ही चाहिए।
मैं मानता हूं कि डॉ. रमन सिंह की दृष्टि विकासपरक  है। वे समाज के सभी वर्गों को साथ लेकर चलना चाहते हैं। उन्हें अटल बिहारी वाजपेयी की परंपरा का नेता भी माना जाता रहा है। लेकिन ऐसे कुछ बिन्दु हैं जिस पर उनसे अगले एक साल के भीतर याने बचे हुए कार्यकाल में निर्णय एवं क्रियान्वयन की अपेक्षा हम करते हैं। छत्तीसगढ़ खनिज और वन संपदा का धनी प्रदेश है। इन बीते वर्षों में इस संपदा का दोहन करने के लिए यहां बेशुमार मात्रा में उद्योगों की स्थापना हुई है। इनसे जो राजस्व मिला है उसके चलते प्रदेश का सालाना बजट तीन हजार करोड़ से बढ़कर अस्सी हजार करोड़ तक पहुंच गया है। लेकिन इस प्राकृतिक संपदा पर जिनका पहला हक है याने आदिवासी- उनकी स्थितियों में कोई बड़ा सुधार हो गया हो ऐसा मानना कठिन है। सलवा जुड़ूम पूरी तरह से असफल हुआ। नक्सल गतिविधियां धीमी जरूर पड़ी हैं, लेकिन इसकी वजह नक्सल आंदोलन के अपने अंतर्विरोधों में अधिक है। बस्तर में अद्र्धसैनिक बलों की भीषण उपस्थिति से स्थिति नियंत्रण में आई हो ऐसा मुझे नहीं लगता। एस.आर.पी. कल्लूरी जैसे अधिकारी को खुली छूट देकर तथा सिविल सोसायटी को प्रताडि़त करने से सरकार की छबि को लाभ नहीं, नुकसान ही पहुंचा है।
कारखानेदारों को पानी पर पहला हक देने और भूमि अधिग्रहण से किसानों में बेचैनी है। रायगढ़, जांजगीर-चांपा आदि इलाकों में इसे स्पष्ट देखा जा सकता है। प्रदेश के विकास के लिए सबसे पहली आवश्यकता शिक्षा और स्वास्थ्य तंत्र को सुधारने की है। इस ओर शासन का ध्यान सिर्फ इमारतें खड़ी कर देने पर है, आवश्यक सुविधाएं मुहैया कराने पर नहीं। विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता का लगातार हनन हो रहा है। प्राथमिक शाला से लेकर इंजीनियरिंग कॉलेजों तक शिक्षकों के नियमित पदों पर भर्तियां बंद हैं। स्वास्थ्य सेवाएं निजी अस्पतालों और बीमा कंपनियों के हाथों सौंप दी गई हैं। अधिकतर सरकारी अस्पताल बेहाल हैं। जब सरकार अपनी उपलब्धियों को गिनाएं तो उसे अपनी कमियां भी देख लेना चाहिए। मैं जगह-जगह घूमता हूं, छत्तीसगढ़ के बारे में लोग मुझसे सवाल करते हैं मेरा जवाब यही होता है कि डॉ. रमन सिंह की निजी छवि के बल पर प्रदेश चल रहा है। बाकी तो मंत्री और अफसर अपनी मनमर्जी कर रहे हैं। डॉ. रमन सिंह को शुभकामनाएं देते हुए मैं उम्मीद करना चाहूंगा कि इन विसंगतियों को दूर करने की दिशा में वे अविलंब कदम उठाएंगे।
देशबंधु में 12 दिसंबर 2017 को प्रकाशित विशेष संपादकीय