Wednesday, 19 July 2017

स्वास्थ्य सेवाओं की दुर्गति-1


 
केन्द्र सरकार को एक नीतिगत निर्णय लेकर शहरी क्षेत्र में निजी अस्पताल खोलने के लिए बैंक ऋण देने पर पाबंदी लगा देना चाहिए; इस निर्णय का दूसरा पहलू यह होगा कि जो डॉक्टर दूरस्थ अंचलों में जाकर अस्पताल स्थापित करना चाहते हैं उन्हें बैंकों से रियायती दर पर कर्ज उपलब्ध कराया जाए। यह संभवत: एक दु:साहसिक निर्णय माना जाएगा। लेकिन इस कदम से देश के दूरस्थ ग्रामीण अंचलों में स्वास्थ्य सेवाओं की जो बदहाली है उस पर किसी हद तक रोक लग सकेगी। विचार करें तो यह प्रस्ताव पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम की 'पुरा' अवधारणा के काफी करीब है। 'पुरा' याने ग्रामीण क्षेत्रों में शहरी सुविधाओं का विस्तार। यह सबके सामने है कि ग्रामीण क्षेत्रों में डॉक्टरों का बेहद अभाव है। शहर और गांव के बीच जनसंख्या के अनुपात में डॉक्टरों की उपलब्धता में बहुत बड़ा फर्क है। आए दिन खबरें सुनने मिलती हैं कि अस्पताल है तो डॉक्टर नहीं, डॉक्टर है तो नर्स या अन्य सहायक नहीं, वे हैं तो दवाईयां नहीं। हाल-हाल में तो इस बारे में बेहद दर्दनाक समाचार सुनने मिले।
कहीं कोई खेतिहर मजदूर अपनी मृत पत्नी का शव कंधे पर ढोकर पन्द्रह-बीस किलोमीटर पैदल गांव की ओर जा रहा है, तो कोई हाथ ठेले में लाश ले जाने पर मजबूर है; किसी गर्भवती स्त्री को अस्पताल लाना हो तो एक नहीं, अनेक अड़चनें सामने आ जाती हैं। ऐसे ही प्रसंग के चलते दशरथ मांझी पर फिल्म बन गई और उसके नाम की चर्चा विदेशों तक हो गई। ग्रामीण इलाकों से बार-बार सुनने में आता है कि वहां महिला चिकित्सकों की पदस्थापना ही नहीं होती और यदि होती है तो कोई वहां रहना नहीं चाहता है। यह स्थिति सिर्फ एलोपैथिक डॉक्टरों की नहीं है, ग्रामीण इलाकों के आयुर्वेदिक अस्पताल भी, अगर कहीं भगवान है तो उसके भरोसे हैं। कुछ वर्ष पूर्व आदिवासी ग्राम दुगली में (जहां राजीव गांधी एक बार स्वयं पधारे थे।) आयुर्वेदिक अस्पताल का सूना भवन मैंने देखा था। छह बिस्तर का अस्पताल, औषधि कक्ष, निरीक्षण कक्ष, डॉक्टर का निवास, सब कुछ योजनाबद्ध तरीके से निर्मित, लेकिन वहां न डॉक्टर था, न कम्पाउंडर और न ड्रेसर। धमतरी से एक कम्पाउंडर बीच-बीच में आकर सेवाएं देता था।
ऐसे प्रसंग देश के हर जिले में आपको मिल जाएंगे, बहुत ढूंढने की जरूरत नहीं होगी। काफी पहले मध्यप्रदेश में नियम था कि मेडिकल कॉलेज से निकले हर डॉक्टर को ग्रामीण अंचल में दो साल सेवा देनी होती थी। उनसे बाँड भरवाया जाता था। अगर गांव नहीं गए तो बाँड की रकम जब्त हो जाती थी। शुरू में यह रकम भारी लगती होगी, लेकिन रुपए के अवमूल्यन के साथ इसका कोई मोल नहीं रहा और डॉक्टर खुशी-खुशी बाँड की रकम जब्त करवाने लगे। उनका एक तर्क है और वह सही प्रतीत होता है कि अगर गांव में अस्पताल का भवन नहीं है, बिजली-पानी नहीं है, रहने की व्यवस्था नहीं है तो ऐसे में वहां जाकर करेंगे भी क्या? यही तर्क सरकारी स्कूलों के शिक्षक भी देते हैं, लेकिन किसी तहसीलदार, डिप्टी कलेक्टर या कलेक्टर को हमने कभी ऐसे किसी तर्क का सहारा लेते नहीं देखा। विगत वर्षों में देश में बहुत छोटे-छोटे जिले बन गए हैं जहां नाममात्र की सुविधाएं हैं, इसके बाद भी कलेक्टर अपने अमले के साथ वहां रहकर काम करते हैं।
पाठकों ने कुछ दिन पहले समाचार पढ़ा होगा कि छत्तीसगढ़ के आदिवासी जिले बलरामपुर के युवा जिलाधीश अवनीश शरण ने अपनी बेटी का दाखिला वहीं के सरकारी स्कूल में करवाया है। दूसरी ओर हम यह भी जानते हैं कि देश के नक्सल प्रभावित इलाकों में पहले मलकानगिरी के जिलाधीश विनील कृष्ण और बाद में छत्तीसगढ़ में सुकमा के जिलाधीश अलेक्स पाल मेनन का नक्सलियों ने अपहरण किया। इन प्रसंगों का जिक्र मैं एक वृहत्तर परिदृश्य को सामने रखने के लिए कर रहा हूं। अगर अभिजात वर्ग के माने जाने वाले आईएएस अधिकारी कठिनाइयों के बीच रह सकते हैं तो डॉक्टर, अध्यापक या इंजीनियर क्यों नहीं? हां! वे ये मांग अवश्य कर सकते हैं कि जहां उनकी पदस्थापना की जा रही है वहां न्यूनतम सुविधाओं वाला निवास स्थान तो उन्हें मुहैया करवाया जाए। लेकिन फिर मुझे याद आता है कि मैंने बैंक मैनेजरों को सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में काम करते देखा है जहां सुविधा के नाम पर कुछ भी न था और इंजीनियरों के बारे में तो कहा ही जाता है कि वे किसी परियोजना में काम करते हुए तिरपाल वाले टेंट में ही रातें बिताते रहे हैं। बस्तर में जब डीबीके रेलवे लाइन बिछ रही थी तब इंजीनियरों को तंबुओं में रहते हुए मैंने देखा है।
मैं आज के समय में ऐसी घनघोर आदर्शवादी स्थिति की वकालत नहीं करना चाहता। लेकिन सरकार ध्यान दे तो एक अवधारणा को अवश्य अंजाम दिया जा सकता है। इसके लिए शायद कलाम साहब की पुरा योजना को थोड़ा संशोधित करना पड़ेगा। छत्तीसगढ़ में लगभग हर विकासखंड को तहसील का दर्जा मिल गया है। हर तहसील के अंतर्गत कुछ उपतहसीलें भी हैं। क्या यह संभव नहीं है कि उपतहसील वाले कस्बे में शासकीय कर्मचारियों  की एक आवासीय कालोनी बना दी जाए जिसमें शिक्षक, डॉक्टर, राजस्व अधिकारी, इंजीनियर, नर्स इत्यादि सब रहें? वे वहां से अपने स्कूल या अस्पताल तक आना-जाना करें और कोई आपात स्थिति हो तो कुछ ही मिनटों में सहायता उपलब्ध कराई जा सके। यह मोबाइल का जमाना है। गांव-गांव में संचार सुविधा उपलब्ध है। अगर ऐसे संकुलों का निर्माण होता है तो मेरी समझ में ग्रामीण समाज को विशेषकर शिक्षा व स्वास्थ्य संबंधी हर आवश्यक सुविधा अपेक्षाकृत आसानी से उपलब्ध हो सकेगी।
स्वास्थ्य सुविधाओं के संबंध में मेरा दूसरा  सुझाव है कि शासकीय चिकित्सकों की पदस्थापना एक पूर्व-निर्धारित रोस्टर के अनुरूप की जाए और उसमें कोई अपवाद न हो। एक डॉक्टर की पहली पोस्टिंग कम से कम तीन साल के लिए दूरस्थ इलाके में हो। तीन साल बाद उसे किसी अपेक्षाकृत बड़े स्थान पर पोस्टिंग की जाए। जैसे-जैसे उसकी निजी आवश्यकताएं और पारिवारिक जिम्मेदारियां बढ़ें वैसे-वैसे उसकी पदस्थापना उस जगह पर हो जहां पहले के मुकाबले बेहतर सुविधाएं मिल सके। इसे यूं समझें कि एक अविवाहित डॉक्टर भले गांव में रह ले, लेकिन जब उसके बच्चों के कॉलेज जाने का समय आए तो वह ऐसी जगह पर रह सके जहां संतान की पढ़ाई मनमाफिक हो सके। यह रोस्टर फार्मूला अन्य सेवाओं में भी लागू किया जा सकता है। अगर मैं गलत नहीं हूं तो आईएएस और आईपीएस अधिकारियों की पदस्थापनाएं कुछ इसी तरह के फार्मूले के तहत होती हैं। रोस्टर प्रथा को सही रूप से लागू करने में एक अड़चन अवश्य है और वह है राजनैतिक हस्तक्षेप की जो कि बर्दाश्त नहीं होना चाहिए।
हमें इसके साथ बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं देने के लिए एक आधारगत संरचना की आवश्यकता है। देखने में यह आया है कि निर्णयकर्ताओं की मुख्य रुचि निर्माण कार्यों में होती है। इतने करोड़ की यह योजना, उतने करोड़ की वह योजना, इसी का झांसा जनता को बार-बार दिया जाता है। इसका प्रतिकार तो जनता को ही करना है, लेकिन जिन्हें देश-प्रदेश की जिम्मेदारियां संभालने के लिए चुना गया है उन्हें भी तात्कालिक स्वार्थ से हटकर इस बारे में सोचना ही पड़ेगा। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान याने एम्स से लेकर मेडिकल कॉलेज व डिस्ट्रिक्ट हॉस्पिटल होते हुए उपस्वास्थ्य केन्द्र तक एक श्रृंखला कायम हो जाए तो बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं देना संभव हो जाएगा। अधिकतर बीमारियां मौसमी और छोटी-मोटी होती हैं, जिनका इलाज उपस्वास्थ्य केन्द्र में संभव है। मर्ज गंभीर हो तो मरीज को शहर या राजधानी के अस्पताल लाने की आवश्यकता पड़ेगी। इसके पूर्व उपकेंद्र का डॉक्टर वीडियो-वार्ता के माध्यम से प्राथमिक उपचार कर सके आज यह भी संभव है। आशय यह कि चिकित्सा तंत्र व्यवस्थित हो तो डॉक्टर भी बेहतर सेवा करने में समर्थ होगा।
फिलहाल मेरी आखिरी बात निजी और सरकारी क्षेत्र को लेकर है। मेरा मानना है कि सरकारी अस्पतालों को सुदृढ़ करना आवश्यक है। यह सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी है। एसडीजी (सतत विकास लक्ष्य) के अंतर्गत चिकित्सा सेवा पर जीडीपी का तीन प्रतिशत खर्च होना चाहिए। भारत सरकार उसके लिए प्रतिश्रुत है, लेकिन वास्तविकता यह है कि सरकारी क्षेत्र में चिकित्सा सुविधा बदतर हो रही है और निजी क्षेत्र फल-फूल रहा है। उसके अनेक कारण हैं। सरकार को ऐसी युक्ति अपनाना ही होगी जिसमें डॉक्टर ग्रामीण अंचल में जाकर सेवा करने के लिए प्रस्तुत हों। जो डॉक्टर अद्र्ध शहरी या कस्बाई केन्द्रों में निजी अस्पताल खोल कर बैठे हैं वे बता सकते हैं कि वे किसी भी तरह से घाटे में नहीं हैं। मरीज से उन्हें फीस तो मिलती ही है, उन्हें ताजी सब्जियां, अनाज, शहद जैसे उपहार भी कृतज्ञतास्वरूप प्राप्त होते हैं। अर्थात यहां गेंद डॉक्टरों के पाले में है।
देशबंधु में 20 जुलाई 2017 को प्रकाशित 

Tuesday, 18 July 2017

दलित हिंदी कविता: मर्मान्तक वेदना और प्रखर चेतना

           

 दलित हिन्दी कविता का वैचारिक पक्ष  लेखक श्यामबाबू शर्मा की नवीनतम पुस्तक है। स्वाभाविक ही विषय पर चर्चा करते हुए लेखक ने प्रारंभ से अंत तक अनेक कविताओं के उद्धरण सामने रखकर अपनी बात की है। इनमें कुछ कविताएं पूरी हैं, कुछ के अंश लिए गए हैं, लेकिन एक जगह पर इतनी सारी कविताओं को पाना, उन्हें पढऩा और उनसे गुजरना एक भीषण अनुभव है। जैसे कि बस्ती में आग लगी हो और उसकी लपटें झुलसा रहीं हों। इन कविताओं में कांटे हैं जो कदम-कदम पर चुभते हैं, गर्म हवा के थपेड़े हैं जो मर्म तक बेचैन कर देते हैं। भारत की विराट सामाजिक संरचना में दलित समुदाय कहां, कैसे, किन परिस्थितियों में जी रहा है, उसका बयान करतीं ये कविताएं सच पूछिए तो किसी व्याख्या की मांग नहीं करतीं। जिन्होंने अपनी आंखें बंद कर रखी हों, उनकी बात करने से क्या लाभ; लेकिन जिनके हृदय की संवेदनाएं मरी नहीं हैं, वे उन दारुण सच्चाइयों का प्रतिबिंब इन कविताओं में पाएंगे जिन्हें वे दिन-प्रतिदिन देख रहे हैं और जिनसे व्यथित होते हैं। यह पुस्तक ऐसे समय आई है जब स्थितियां सुधरने के बजाय अधिक विकराल हो रही हैं; तब दलित हिन्दी कविता का कथ्य और लेखक द्वारा उसके वैचारिक पक्ष की विवेचना पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक, कहीं अधिक महत्वपूर्ण और कहीं अधिक आवश्यक हो जाती है। 

हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय में दलित शोधार्थी रोहित वेमुला की आत्महत्या एक ऐसा प्रकरण था जिसने पूरे देश के संवेदी समाज को हिलाकर रख दिया था। सत्ताधीशों द्वारा इस त्रासदी को छोटा करने के लिए जितने भी उपक्रम किए गए उनसे उन्हीं का बौनापन उजागर हुआ। गुजरात में दलितों पर अत्याचार और उसके प्रतिकार में जिग्नेश मेवाणी के नेतृत्व में एक नए आंदोलन का उदय, सहारनपुर में दलित बस्तियों में घर जलाने और उन्हें प्रताडि़त करने की घटनाएं, उसके प्रत्युत्तर में नौजवान चंद्रशेखर आज़ाद की अगुवाई में आंदोलन- ये सारे प्रसंग हाल-हाल के हैं। इनसे पता चलता है कि वर्चस्ववादी समाज अपनी पुरानी खोखली और सड़ चुकी मान्यताओं और परिपाटियों को छोडऩे के लिए तैयार नहीं है; वहीं दूसरी ओर वंचित, शोषित, दलित समाज में नई चेतना का उदय हो रहा है, अब वह यथास्थिति को बर्दाश्त करने के लिए तैयार नहीं है, वह प्रतिकार कर रहा है। उसने देशज परंपरा में ही अपने आदर्श पाए हैं जिनसे वह प्रेरणा पाकर एक नए जोश के साथ बेहतर स्थितियों की तलाश में आगे बढ़ रहा है। 

आधुनिक समय में दया पवार की मूल मराठी में लिखी गई आत्मकथा अछूत  संभवत: पहली पुस्तक थी, जिसने साहित्य जगत का ध्यान दलित समुदायों की विवश नारकीय जीवन परिस्थितियों की ओर खींचा था। उसके बाद तो मराठी से अनूदित होकर अनेक दलित लेखकों की आत्मकथाएं पाठकों के सामने आईं। नारायण सुर्वे और नामदेव ढसाल ने अपनी कविताओं से ध्यान आकृष्ट किया, सतीश कलसीकर ने दलित चिंतक के रूप में पहचान कायम की। मराठी के दलित साहित्य आंदोलन का असर अन्य भाषा-भाषी प्रांतों में भी हुआ। पंजाबी, उडिय़ा, तेलगु, गुजराती सभी भाषाओं में दलित साहित्य ने स्थान बनाया। हिन्दी में डॉ. धर्मवीर, ओमप्रकाश वाल्मीकि, सूरजपाल चौहान, मोहनदास नेमिश्यराय, कंवल भारती इत्यादि लेखकों ने मुख्यत: जो आत्मकथ्य लिखे उन्होंने साहित्य के कितने ही प्रतिमान बदल दिए। बजरंगबली तिवारी जैसे विद्वानों ने हिन्दी साहित्य सहित तमाम भारतीय भाषाओं में लिखे गए और लिखे जा रहे दलित साहित्य पर विस्तारपूर्वक विवेचन किया है। रमणिका गुप्ता युद्धरत आम आदमी पत्रिका  का प्रकाशन करती हैं जिसमें हाशिए के लोगों को केन्द्र में रखी गई रचनाएं छपती हैं। राजेन्द्र यादव को यह श्रेय जाता ही है कि उन्होंने हंस में दलित विमर्श को अपनी पत्रिका का स्थायी भाव बनाकर उस दिशा में सोचने पर पाठकों को मजबूर किया। इस बीच दलित समुदाय की सामाजिक स्थितियों और दलित साहित्य रचना को लेकर काफी गंभीर काम हुआ है। श्यामबाबू शर्मा की नई पुस्तक इस शृंखला में एक महत्वपूर्ण कड़ी है, जिसमें विषय विवेचन की दृष्टि से एक नयापन है और बहुत से अनछुए पहलुओं पर चर्चा की गई है। 

लेखक ने लगभग दो सौ पृष्ठ की किताब को ग्यारह अध्याय में बांटा है। पहले अध्याय का ही शीर्षक है विमर्श: अनछुए पहलू। यहां से प्रारंभ कर लेखक वैश्वीकरण के दौर में सामाजिक संबंधों की परीक्षा करता है और अंत तक पहुंचते हुए उसे अर्थयुग : अर्थहीन विश्वबंधुत्व  निरुपित करता है। श्यामबाबू के साहित्य संबंधी विचार स्पष्ट हैं। उनका मानना है कि साहित्य के प्रयोजन में मानवीय चिंताएं और संवेदना की शीतलता सर्वोपरि होना चाहिए। उदात्त मूल्यों से रहित और सामाजिक सरोकारों से इतर रचा गया साहित्य या तो बौद्धिक जुगाली है या फिर बौद्धिक प्रलाप। अपने कथन के समर्थन में वे टालस्टाय को उद्धृत करते हैं। वे आचार्य रामचन्द्र शुक्ल द्वारा दी गई साहित्य की परिभाषा में जोड़ते हुए दलित साहित्य की व्याख्या करते हैं कि वह समाज का दर्पण मात्र नहीं है, बल्कि उसे प्रेरणा और दिशा भी देता है। श्यामबाबू का मानना है कि दलितों ने अपने दर्द और अनुभवों को अभिव्यक्ति करने के लिए स्वयं हाथ में कलम ली तथा जीवन के हर पहलू पर उसके अंतर्गत विचार किया। लेखक पंडित नेहरू के सदाशय का उल्लेख करता है कि किसी दिन वैकल्पिक सामाजिक संगठन का उदय होगा जो हिन्दू जाति को जाति व्यवस्था से मुक्त कर उसका स्थान लेगा; लेकिन उसका अनुभवजन्य विश्वास है कि भारतीय समाज की वर्ण व्यवस्था का ढांचा ऐसे किसी प्रगतिशील संगठन के उद्भव की प्रक्रिया तक को सहन नहीं करता। इसका विकल्प एक ही था कि दलित साहित्य समतामय समाज की सजग मानवीय धारा का निर्माण करे। 

लेखक कबीर और रैदास की पदावलियों से उद्धरण देते हुए आगे बढ़ता है। इसके पहले वह सवाल उठाता है कि आदि कवि क्रौंचवध की पीड़ा से आहत हुए, किन्तु उन्हें शंबूक की हत्या दिखाई नहीं दी। वह मध्यकाल में रचे गए अधिकतर भक्ति साहित्य को इसी आधार पर खारिज करता है। कबीर और रैदास की परंपरा में बीसवीं सदी में स्वामी अछूतानंद और हीरा डोम जैसे कवि आते हैं। यहां लेखक आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी को एक लोकमंगलवादी संत की उपाधि देता है, जिन्होंने सरस्वती  में पहले-पहल हीरा डोम की कविता छापी। यह कविता खड़ी बोली में न होकर भोजपुरी में थी तथा लेखक के अनुसार इस कविता में जो टीस है वह हृदय को चीर देती है। वह स्वामी अछूतानंद की कविता मनु जी तैने वर्ण बनाए चार  को उद्धृत करते हुए बतलाता है कि ऐसी कविताओं के माध्यम से दलितों की पीड़ा को कैसे वाणी मिली। अछूतानंद जी ने बाबा साहब अम्बेडकर से मुलाकात की थी और उन्हें अपना नेता माना था। बाबा साहब ने निश्चित ही दलित समाज में राजनीतिक चेतना उत्पन्न करने का बड़ा काम किया जिसकी शुरूआत महात्मा ज्योतिबा फुले और सावित्री बाई फुले ने कर दी थी।

दलित विमर्श के अनछुए पहलुओं से अपनी बात प्रारंभ करते हुए श्यामबाबू सरहपाद का उल्लेख करते हैं जिन्होंने लगभग एक हजार वर्ष पूर्व कहा था कि ब्राह्मण ब्रह्मा के मुख से उत्पन्न हुए थे, जब हुए थे तब हुए थे, इस समय तो वे भी दूसरे लोग जैसा पैदा होते हैं वैसे ही पैदा हुए हैं, फिर ब्राह्मणत्व की बात ही कहां उठती है। पहले अध्याय में लेखक ने यूरोप और भारत के अनेक बौद्धिकों के उन विचारों का उल्लेख किया है जिनसे उत्तर आधुनिकता की अवधारणा का जन्म हुआ और फिर कैसे उत्तर आधुनिकता ने विश्व समाज को प्रभावित किया। श्यामबाबू का मानना है कि उत्तर आधुनिकतावाद के विचार ने ही नवपूंजीवाद और नवसाम्राज्यवाद को जन्म दिया है, लेकिन इसके साथ-साथ सामाजिक विमर्श केन्द्रीयकृत न होकर परिधि पर विस्तृत हुआ है जिसके कारण हाशिए के लोगों को अपनी आवाज उठाने का अवसर मिला है। यद्यपि इससे दलितजन की स्थिति में कोई खास फर्क नहीं पड़ा। 

इस पुस्तक को विभिन्न अध्यायों में विभाजित कर लेखक ने प्रयत्न किया है कि दलित समाज की परिस्थितियां और उसके समक्ष उपस्थित नई-पुरानी चुनौतियों का प्रतिबिंब दलित कविता पर जिस प्रकार पड़ा उसे सिलसिलेवार प्रस्तुत किया जाए। लेखक की अपनी कोशिश है, किन्तु एक पाठक के नाते मुझे लगता है कि यह पुस्तक एक अतिदीर्घ निबंध है, जिसे सुविधा के लिए भले अध्यायों में बांट दिया गया हो, किन्तु विचारों का तीव्र प्रवाह अध्यायों की सीमा में बंधने से इंकार करता है। हर अध्याय की शीर्षक के अनुरूप पृथक भावभूमि तो है, लेकिन वहीं तक सीमित नहीं है। कहना आवश्यक है कि इससे विषय की गंभीरता कहीं भी प्रभावित नहीं होती और न विचारक्रम ही कहीं टूटता है। तीसरे अध्याय का शीर्षक है- स्वानुभूति बनाम सहानुभूति का रचना संसार । इसमें लेखक इस बहस में शामिल होता है कि क्या दलित साहित्य वही है जो सिर्फ दलित लिखे अथवा गैरदलित लेखकों को भी यह अधिकार है। बात यहां कभी प्रचलित जुमले भोगा हुआ यथार्थ की है। श्यामबाबू अनेक दलित रचनाकारों से सहमत नज़र आते हैं कि दलितों द्वारा रचित ही दलित साहित्य है। यद्यपि अनेक स्थानों पर लेखक ने गैरदलित लेखकों और विचारकों के कथ्यों को दलित के पक्ष के समर्थन में खड़ा किया है। 

इस पुस्तक का शायद सबसे महत्वपूर्ण और सबसे उल्लेखनीय अध्याय है दलित स्त्री का अरण्य रोदन । इसमें लेखक ऐतिहासिक साक्ष्य सामने रखता है कि विश्व समाज में स्त्री का स्थान पुरुष की अपेक्षा हमेशा निम्नतर रहा है। बात जब दलित समुदाय पर आती है तो स्थितियां अधिक निर्मम व कठोर रूप में सामने आती है। अध्याय में मोहनदास नेमिश्यराय का कथन उद्धृत है कि दलित महिलाओं का संघर्ष दोहरा है क्योंकि उनका दोहरा शोषण हो रहा है। उन्हें एक गाल पर ब्राह्मणवाद का तो दूसरे गाल पर पितृसत्ता का थप्पड़ खाना पड़ता है। यह क्रूर वास्तविकता है और इससे कौन सहमत न होगा! यहां जो कवितांश दिए गए हैं मर्मांतक हैं और झकझोर कर रख देते हैं। 

अन्य अध्यायों में एक में लेखक ने नस्लवाद का प्रश्न उठाया है। इसमें हिटलर की जर्मनी, दक्षिण अफ्रीका का रंगभेद, अमेरिका में रंगभेद इत्यादि का उल्लेख किया गया है। लेखक का मानना है कि भारत के दलित समुदाय की स्थिति इनसे बहुत भिन्न नहीं है। विगत कुछ दशकों में राजनीति में जो चारित्रिक गिरावट आई है उसका भी संज्ञान लेखक ने लिया है। विचारहीन, स्वार्थकेन्द्रित राजनीति ने लोकतांत्रिक सिद्धांतों को परे ढकेल दिया है जिसका खामियाजा दलित शोषित समाज को भुगतना पड़ रहा है। लेखक का एक कथन गौरतलब है- मंत्रणा-यंत्रणा से उर्वरित दलितों की प्रताडऩा ब्राह्मणवादी वैचारिकता का सामंती गठबंधन है। एक अन्य अध्याय में बाजार की मृगमरीचिका ने वंचितजनों को किस तरह छला है उसका विस्तारपूर्वक उल्लेख है। लेखक का साफ कहना है कि पूंजीवाद छलावा है, मृगमरीचिका है जिसमें जनता के अधिकार स्खलित हुए हैं। वह कहता है कि हाशिएकृतजन केन्द्र में आ ही रहे थे कि नवपूंजीवाद ने उन्हें गुमराह कर दिया। बाजार के जादू से इनकी खोपड़ी भन्नाई हुई है। 

एक अध्याय का शीर्षक है- पहाड़ तुम कब बदलोगे । लगता है मानो किसी कविता का शीर्षक है। लेकिन लेखक का आशय यहां उस सुखजीवी वर्ग से है जो पहाड़ की तरह अविचलित है। वह बस मसनद लगाए बैठा है, बिना कुछ किए सब कुछ पा लेने का लालच उसे है, अपने अलावा उसे किसी से कोई मतलब नहीं है। ऐसा नहीं कि लेखक सिर्फ सवर्ण अभिजात वर्ग की ही भर्त्सना कर रहा है। वह अगले अध्याय में दलित समाज में आई अभिजात मानसिकता का समाजशास्त्रीय विश्लेषण करते हुए उनकी आलोचना करने से भी पीछे नहीं हटता। कहने की आवश्यकता नहीं कि हर अध्याय में दर्जनों कविताओं के उद्धरण दिए गए हैं। ये कविताएं अपने आप में दलित साहित्य के वैचारिक पक्ष को बहुत मजबूती, गहरे मानसिक उद्वेग और सच्चाई के साथ प्रस्तुत करती हैं। युवा लेखक श्यामबाबू शर्मा को मैं उनकी इस पुस्तक के लिए बधाई देता हूं। मैं यहां उल्लेख करना आवश्यक समझता हूं कि श्यामबाबू भले ही हिंदी साहित्य के डॉक्टर हों, लेकिन वे केंद्र सरकार के किसी ऐसे विभाग में नौकरी कर रहे हैं जिसका साहित्य पढऩे-लिखने से दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं है। यह लेखक का अपना जीवट व अध्यवसाय है जिसने उसे निरंतर लेखन हेतु प्रेरित किया है। हमें उनसे आगे भी बहुत उम्मीद है।
अक्षर पर्व जुलाई 2017 अंक की प्रस्तावना 
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पुस्तक- दलित हिन्दी कविता का वैचारिक पक्ष
लेखक- श्याम बाबू शर्मा
प्रकाशक- अनुज्ञा बुक्स, 1/10206, वेस्ट गोरख पार्क शाहदरा- दिल्ली-110032
मो. 09350809192
पृष्ठ- 200
मूल्य- 200 रुपए मात्र

Wednesday, 12 July 2017

जीएसटी : परेशानियों का अंबार




1 जुलाई 2017 से हर कीमत पर जीएसटी लागू करने के फैसले ने सरकार के सामने परेशानियों का अंबार लगा दिया है। अरुण जेटली और उनके अधिकारी अपने फैसले पर खुद की पीठ लाख थपथपा लें, अंतत: इन परेशानियों को दूर करने की जिम्मेदारी उनकी ही है। सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि नई कर व्यवस्था से व्यापारियों और ग्राहकों को क्या नफा-नुकसान हो रहा है। प्रश्न यह भी है कि इस व्यवस्था से जो लाभ सरकार उठाना चाहती है, वह उसे एक निश्चित समयावधि में मिल पाएगा या नहीं और यदि व्यवस्था ठीक करने में अपेक्षा से अधिक विलंब हुआ तो उसके प्रतिकूल प्रभाव क्या होंगे? अभी जो खबरें आ रही हैं वे सबको भ्रम में डाल रही है.  आम जनता तो यह समझने में बिल्कुल असमर्थ है कि जीएसटी को लागू ही क्यों किया हैजिस व्यापारी वर्ग ने नरेन्द्र मोदी पर विश्वास करते हुए भाजपा को प्रचंड बहुमत के साथ सरकार बनाने का मौका दिया थावह अपने को छला गया महसूस कर रहा है। उसे लगने लगा है कि नरेन्द्र मोदी वोट बैंक की राजनीति कर रहे हैं और इस फेर में उन्होंने भाजपा के परंपरागत समर्थकों, सहयोगियों और संरक्षकों के हितों की अनदेखी कर दी है।
लंदन से प्रकाशित  इकानॉमिस्ट विश्व की सर्वश्रेष्ठ पत्रिका मानी जाती है। यह पत्रिका पूंजीवादी आर्थिक नीति और राजनीति का समर्थन करती है। इसे नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने से बहुत उम्मीदें थीं कि भारत की अर्थव्यवस्था में क्रांतिकारी परिवर्तन आएगा। नरसिंह राव-मनमोहन सिंह के कार्यकाल में तथाकथित आर्थिक सुधारों का पहला चरण पूरा हुआ था। द इकानॉमिस्ट जिस विचार समूह से ताल्लुक रखती है उसे मोदी जी के कार्यकाल में आर्थिक सुधारों का दूसरा चरण लागू होने की पूरी-पूरी उम्मीद थी।इसमें शक नहीं कि रेलवे सेवाओं का निजीकरण, रक्षा क्षेत्र में निजी क्षेत्र को प्रवेश, एयर इंडिया को कंगाल बनाकर बेचने की तैयारी कुछ ऐसे ही कदम रहे हैं। लेकिन यही पत्रिका 24 जून के अपने अंक में मुख पृष्ठ पर नरेन्द्र मोदी का कार्टून छापते हुए शीर्षक देती है- मोदीज़ इंडिया :  इल्यूज़न ऑफ रिफॉर्म अर्थात मोदी का भारतसुधारों की मृगमरीचिका । पत्रिका के अग्रलेख का भी शीर्षक है कि मोदी वैसे सुधारवादी नहीं हैं जैसे दिखाई देते हैं।
मैं इस पत्रिका को इसलिए उद्धृत कर रहा हूं कि कारपोरेट विश्व में इसकी टिप्पणियों को गंभीरता के साथ लिया जाता है। द इकॉनामिस्ट के इस अंक में भारत के वर्तमान परिदृश्य पर तीन लेख हैं। एक लेख में कहा गया है कि जीएसटी का स्वागत है, किन्तु यह अनावश्यक रूप से जटिल और लालफीताशाही से ग्रस्त है जिसके कारण इसकी उपादेयता बहुत घट गई है। पत्रिका यह भी कहती है कि प्रधानमंत्री मोदी ने भले ही जोरदार प्रचार के साथ बहुत सी योजनाएं प्रारंभ कर दी हों, लेकिन इनमें से अनेक तो पहले से चली आ रही थीं। जीएसटी का प्रस्ताव भी पुराना था। पत्रिका नोट करती है कि अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिए जिस व्यवस्थित रूप में कार्य होना चाहिए उसे नरेन्द्र मोदी करने में समर्थ प्रतीत नहीं होते। जीएसटी की चर्चा करते हुए द इकानॉमिस्ट का कहना है कि अब पहले के मुकाबले कई गुना ज्यादा फार्म भरना पड़ेंगे। इसके अलावा जीएसटी वाले अन्य देशों में जहां टैक्स की सिर्फ एक दर है वहां भारत में शून्य से लेकर अठ्ठाइस तक दरें तय की गई हैं। इसके चलते सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में जो दो प्रतिशत की वृद्धि अनुमानित की गई थी वह अब शायद एक प्रतिशत भी न बढ़ पाए।
भारत के पूर्व वित्तमंत्री, भाजपा के वरिष्ठ नेता व मार्गदर्शक मंडल के सदस्य यशवंत सिन्हा ने पिछले दिनों जीएसटी पर दिए एक साक्षात्कार में जो कहा है वह भी सरकार की आशा-अपेक्षा के विपरीत है। यशवंत सिन्हा कहते हैं कि जीएसटी की अवधारणा तो उनके समय की है, लेकिन इसे जिस रूप में लागू किया गया है वह अपने मूलरूप से एकदम भिन्न है और इसमें बहुत खामियां हैं।श्री सिन्हा बतलाते हैं कि एक नीतिगत निर्णय के तहत उन्होंने सेंट्रल एक्साइज की ढेर सारी दरों को घटाकर मात्र तीन दरों पर ला दिया था। उद्देश्य यह था कि जीएसटी लागू होने के साथ तीन दरें भी समाप्त होकर मात्र एक दर रह जाएगी, लेकिन हुआ इसके उल्टा है। तीन की बजाय अब छह दरें हो गई हैं तथा सर्विस टैक्स जिसकी सिर्फ एक दर थी, वह अनेक दरों में बिखर गया है। सिन्हा तो यहां तक कहते हैं कि डॉ. मनमोहन सिंह का वित्त मंत्री के रूप में 1991 का बजट देश का सबसे बड़ा आर्थिक सुधार था, जबकि जीएसटी एक अप्रत्यक्ष कर सुधार से अधिक कुछ नहीं है।
प्रतीत होता है कि मोदी सरकार पर इन आलोचनाओं का कोई असर नहीं है। वित्तमंत्री ने इस बीच दो विचित्र वक्तव्य दिए हैं। एक में उन्होंने कहा कि जीएसटी बहुत आसानी से लागू हो गया, कि उसमें कोई कठिनाई देश में नहीं आई। शब्द अलग हो सकते हैं, भाव यही था। दूसरे में उन्होंने कहा कि टैक्स तो ग्राहक चुकाता है व्यापारी इसका विरोध क्यों कर रहे हैंजेटली साहब बहुत बड़े वकील हैं। उनके तर्कों का जवाब देना सामान्यत: मुश्किल होता है, लेकिन ऐसा लगता है कि दो बड़े विभागों की जिम्मेदारी संभालते हुए, साथ-साथ प्रधानमंत्री की गैरमौजूदगी में सरकार का दायित्व संभालने के कारण वे शायद थक जाते हैं और अपने तर्क तैयार करने के लिए उन्हें मानसिक अवकाश नहीं मिल पा रहा है। अन्यथा कौन नहीं जानता कि सरकार को जीएसटी लागू करने के लिए कितने पापड़ बेलने पड़े हैं। उन्होंने व्यापारी वर्ग की आलोचना तो कर दी किन्तु इस हकीकत पर ध्यान नहीं दिया कि जटिल कर प्रणाली में व्यापारी को ग्राहक से टैक्स की राशि लेने, जमा करने और उसके रिटर्न आदि भरने में कितनी मुश्किलें पेश आ सकती हैं।
जो कारपोरेट व्यवसायी हैं उन्हें संभवत: जीएसटी से कोई परेशानी नहीं है। उनके पास साधन-सुविधाएं हैं कि टैक्स के मामले संभालने के लिए जितनी आवश्यकता हो उतने कर्मचारी नियुक्त कर लें, चार्टर्ड एकाउंटेंट और कंपनी सेक्रेटरियों की सेवाएं ले लें; कहीं कुछ कोर-कसर रह जाए और कानूनी कार्रवाई की नौबत आए तो उससे निपटने के लिए भी श्री जेटली जैसे बड़े वकीलों की सेवाएं उन्हें उपलब्ध हो सकती हैं। हमने देखा है कि आयकर विभाग के बड़े-बड़े छापे पड़ते हैं और बाद में सब बच जाते हैं। छोटे और मझोले व्यापारियों को ये सुविधाएं प्राप्त नहीं हैं। अभी इतना जरूर हुआ है कि अंतरराज्यीय नाके खत्म हो गए हैं, लेकिन फ्लांइग स्क्वॉड का भय तो पहले से अधिक बढ़ गया है। व्यापारी वर्ग गुहार लगा रहा है कि इंस्पेक्टर राज वापिस आ गया है। उन्हें डर लग रहा है कि छोटी सी गलती हो जाने पर भी गिरफ्तारी हो सकती है। उनका यह भय निराधार नहीं है। व्यवस्था पहले उसी पर प्रहार करती है जो अपेक्षाकृत कमजोर होता है।
यह आम जनता की सिफत है कि तकलीफों के बीच भी वह मुस्कुराने के लिए अवसर ढूंढ लेती है। अभी एक चुटकुला चल रहा है कि बेटी को सुखी रख सके ऐसा दामाद चाहिए तो चार्टर्ड एकाउंटेंट ढूंढ लो, क्योंकि आने वाले दिनों में उसी का धंधा जोरों से चलने वाला है। इस चुटकुले में सच्चाई निहित है। अभी देश भर के जितने सीए हैं किसी को सिर उठाने की भी फुर्सत नहीं है। जीएसटी के प्रावधानों में ऐसे-ऐसे पेंच हैं कि सीए उनको समझने में परेशान हो रहे हैं। एक दूसरा चुटकुला भी आजकल में देखा। एक पत्रकार ने टिप्पणी की- काजू पर पांच प्रतिशत जीएसटी लेकिन बादाम पर बारह प्रतिशत। दोनों सूखे मेवे हैं फिर ऐसी विसंगति क्यों? दूसरे पत्रकार ने जवाब दिया- बादाम खाने से दिमाग तेज होता है यह हम बचपन से सुनते आए हैं। सरकार चाहती है कि हमारे लोगों का दिमाग तेज न हो, वे बुद्धू बने रहें इसलिए बादाम पर ज्यादा कर लगाया है।यह तो चुटकुलों की बात हुई, लेकिन ये चुटकुले हकीकत बयान करते हैं। 
30 जून और 1 जुलाई की मध्यरात्रि से जीएसटी लागू हुआलेकिन सरकार ने इस बीच क्या किया? 30 जून की शाम रासायनिक खाद पर जीएसटी की दर बारह प्रतिशत से घटाकर पांच प्रतिशत कर दी। उसे यह ख्याल नहीं आया कि कीटनाशक पर टैक्स की दर भी उसी तरह कम कर देते जबकि दोनों का अंतिम उपयोग एक ही है। दूसरा प्रकरण है मध्यरात्रि के बाद का। जीएसटी लागू होने के एक घंटे बाद मोबाइल फोन पर दस प्रतिशत अतिरिक्त कस्टम ड्यूटी लगा दी गई। इसका कारण मुझे समझ नहीं आया। यह देखकर भी आश्चर्य हुआ कि टीवी, फ्रिज जैसी सामग्री पर टैक्स की दर बढ़ा दी गई, जबकि कार की कीमतें कम हो गईं। जिस देश में सार्वजनिक परिवहन को बढ़ाने की आवश्यकता है, वहां निजी वाहन को प्रोत्साहन देना समझ नहीं आता। तब तो और भी नहीं जब कृषि उपयोगी ट्रैक्टर पर कार के मुकाबले ज्यादा कर लगे। इन सबसे जो मुश्किलें सरकार के सामने पेश आएंगी, देखना होगा कि सरकार उनसे कैसे निपटती है।
देशबंधु में 13 जुलाई 2017 को प्रकाशित 

Wednesday, 5 July 2017

जीएसटी : संघीय ढाँचे पर प्रहार?


 यह पहेली आम जनता तो क्या, अच्छे-अच्छे पंडित भी नहीं सुलझा पा रहे हैं कि केन्द्र सरकार ने जीएसटी लागू करने में हठीलेपन और किसी हद तक जल्दबाजी का सहारा क्यों लिया। सर्वविदित है कि जीएसटी की अवधारणा अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री काल में सामने आ चुकी थी। मनमोहन सिंह सरकार में इसे अमलीजामा पहनाने की कोशिशें शुरु हुईं। चूंकि इस केन्द्रीय कानून को बनाने के लिए राज्य सरकारों की सहमति आवश्यक थी इसलिए स्वाभाविक तौर पर प्रक्रिया धीरे चली। अधिकतर राज्य जीएसटी तंत्र लाने के लिए सहमत हो गए थे, लेकिन दो राज्यों ने इसका पुरजोर विरोध किया था, जिनमें एक था गुजरात और दूसरा मध्यप्रदेश। इन दोनों प्रदेशों के तत्कालीन मुख्यमंत्री उस वक्त तक प्रधानमंत्री बनने के लिए अपना अभियान भी शुरू कर चुके थे। दोनों शायद चाहते थे कि जब प्रधानमंत्री बनें तभी यह कानून लागू हो और उसका श्रेय लेकर वे इतिहास में अपना नाम अमर कर सकें! नरेन्द्र मोदी के तब के और अब के वक्तव्यों में जो उत्तर और दक्षिण ध्रुव का फासला दिखाई देता है उसका कारण शायद इस मनोभाव में ढूंढा जा सकता है!
बहरहाल कानून तो लागू हो गया है। मेरी अल्पबुद्धि कहती है कि मोदीजी ने दो कारणों से अपने पुराने रुख को छोड़ कर जीएसटी कानून बनाने की पहल की। एक तो शायद उनकी यह मंशा है कि देश का संघीय ढांचा खत्म होकर उसकी जगह पर एक केन्द्रवर्ती और केन्द्र-निर्भर शासन व्यवस्था पर देश चलने लगे। दूसरा कारण संभवत: यह है कि मोदीजी विश्वग्राम के चातुर्देशिक अर्थतंत्र के साथ भारतीय अर्थव्यवस्था की सगाई मुकम्मल करना चाहते हैं। उचित होगा कि हम पहले बिन्दु को यहां स्पष्ट कर लें। पाठकों को यह स्मरण कराने की आवश्यकता नहीं है कि श्री मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के साथ सहकारी संघवाद का नारा उछाल दिया था। यह सहकारी संघवाद क्या है, यह समझना बहुत कठिन है, कुछ उसी तरह जैसे एकात्म मानवतावाद को भी आम जनता नहीं समझ पाती। बस एक लुभावनी संज्ञा है जिसके फेर में लोग पड़ जाते हैं। यह विचार भारतीय जनता पार्टी और उसकी पितृसंस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विचारों के अनुकूल है कि देश में एक केन्द्रीय सत्ता स्थापित हो।
भारत का संविधान अपने देश की कल्पना एक संघीय गणराज्य के रूप में करता है। ऐसा देश जिसमें एक केन्द्रीय सरकार तो हो, लेकिन जिसमें राज्यों को पर्याप्त अधिकार दिए गए हों। संविधान ने राजकाज के विषयों की तीन सूचियां स्पष्ट निर्देशित की हैं- केन्द्रीय सूची, राज्यों की सूची और तीसरी समवर्ती सूची जिसमें केन्द्र और राज्य को मिलजुल कर या परस्पर सहमति से निर्णय लेना है। नरेन्द्र मोदी भारत के संविधान को अपने तईं सबसे पवित्र पुस्तक घोषित कर चुके हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि संविधान में जो लिखा है उस पर उनका अटूट भरोसा है। तब फिर संविधान में लिखी बात को एक किनारे कर अर्थात संघीय गणराज्य की अवधारणा को नकार कर सहकारी संघवाद कहने से क्या प्रयोजन सिद्ध होता है? इसे सुनकर तो यही अनुमान होता है कि वे देश का एक नया राजनीतिक ढांचा तैयार करने के उपक्रम में जुटे हैं जिसमें जीएसटी कानून मददगार हो सकता है; ठीक वैसे ही जैसे विमुद्रीकरण से नेहरूवादी आमराय को खत्म करने का प्रयास किया गया (देखें विक्रम सिंघल का तारीख 12 जून का इसी पृष्ठ पर लेख)।
यहां एक पुराने दृष्टांत की चर्चा करने से बात और स्पष्ट होगी। श्रीमती इंदिरा गांधी के कार्यकाल में शहरी चुंगीकर समाप्त करने का प्रस्ताव कांग्रेस सरकार ने दिया था। इसमें फैसले लेने का जिम्मा राज्य सरकारों पर छोड़ा गया था। मध्यप्रदेश पहला राज्य था जहां मुख्यमंत्री श्यामाचरण शुक्ल ने 1976 में चुंगी कर या ऑक्ट्रॉय खत्म कर दिया था। इससे जनता को थोड़ी राहत तो मिली कि वे नगरपालिका के चुंगी कर्मियों द्वारा की जा रही अवैध वसूली से निजात पा गए, किन्तु दीर्घकालीन परिणाम अच्छा नहीं रहा। प्रदेश सरकार ने तय किया था कि नगरीय निकायों को चुंगी क्षतिपूर्ति राशि दी जाएगी। यह व्यवस्था चालीस साल से चल रही है। दुष्परिणाम यह हुआ है कि नगरीय निकाय अपनी आर्थिक सेहत के लिए राज्य सरकार के मोहताज हो गए। रायपुर की एक कांग्रेसी महापौर किरणमयी नायक को सरसंघचालक पर पुष्पवर्षा करने के लिए विवश होना पड़ा था। आज वर्तमान महापौर प्रमोद दुबे भी सरकारी दबाव के आगे नतमस्तक नज़र आते हैं।

आज स्थिति ये है कि रायपुर सहित सभी नगर निगमों के स्कूल सरकार के अधीन कर दिए गए हैं। रायपुर का बूढ़ा तालाब मुंबई की किसी निजी कंपनी को सौंप दिया गया है। स्मार्ट सिटी के नाम पर अरबों रुपए का कर्ज लिया जा रहा है जिसमें नगर के मात्र दो-ढाई वर्ग किलोमीटर क्षेत्र का कथित विकास होगा और शहरवासियों की अगली पीढिय़ां कर्ज चुकाएंगी। रायपुर में ईएसी कालोनी के मकान ध्वस्त कर वहां बगीचा बन रहा है और रामसागरपारा के खाली पड़े मैदान में शॉपिंग काम्पलेक्स के टेंडर निकल रहे हैं। जो रायपुर का, वही हाल अन्य नगरों का भी। इतने विस्तार से यह बात इसलिए कहना पड़ी कि आने वाले वर्षों में राज्य अपनी आर्थिक स्थिति संभालने के लिए पूरी तरह केन्द्र पर निर्भर हो जाएंगे। जीएसटी प्रावधान के तहत राज्यों को पांच साल तक वाणिज्य कर इत्यादि की क्षतिपूर्ति मिलेगी, लेकिन उसके बाद क्या होगा? जब केन्द्र सरकार ही सारी टैक्स वसूली करेगी तो राज्य अपने लिए संसाधन कहां से जुटाएंगे? इसमें तो यह भी होगा कि भाजपा के मुख्यमंत्री भी केन्द्रीय सत्ता के सामने चूं-चपड़ नहीं कर पाएंगे। मैं नहीं जानता कि कितनी राज्य सरकारों ने इस बिन्दु पर गंभीरता से विचार किया है।
केन्द्र सरकार के जीएसटी के प्रति उत्साह का दूसरा बिन्दु ध्यानयोग्य है। यह तो सरकार स्वयं कह रही है कि दुनिया के एकसौ साठ से अधिक देशों में जीएसटी लागू है। इसलिए हमें भी यह रास्ता अपनाना था। एक तरह से बात ठीक है। यह नवसाम्राज्यवाद का दौर है और नवपूंजीवादी व्यवस्था के अंतर्गत सारा व्यापार संचालित हो रहा है। बहुराष्ट्रीय कंपनियां, बल्कि राष्ट्रों की सीमा का अतिक्रमण कर व्यवसाय करने वाली कंपनियां (सुप्रा नेशनल कार्पोरेशन अथवा सीएनसी और ट्रांस नेशनल कार्पोरेशन अथवा टीएनसी) व्यापार में सुगमता के मानदंड पर किसी देश में व्यापार करती हैं। वे देखती हैं कि किस देश में उन्हें कितनी ज्यादा सहूलियतें हैं। भारत का बाज़ार बहुत बड़ा है, यहां विनिर्माण क्षेत्र कमजोर है, इन दो वजहों से ये कार्पोरेट भारत में व्यापार तो करना चाहती हैं, लेकिन सुगमता का वातावरण (ईज़ ऑफ बिजनेस) न होने से बिदक जाते हैं।
पाठकों को याद होगा कि कुछ वर्ष पूर्व मोबाइल सेवाप्रदाता वोडाफोन को आयकर संबंधी किसी बड़ी पेचीदगी में फंसना पड़ा था। यह अभी कुछ दिन पहले की खबर है कि जनरल मोटर्स ने भारत में अपना काम समेटा तो नहीं है पर सीमित कर लिया है। हमने जो अमेरिका इत्यादि के साथ आणविक करार किए हैं उनमें भी मुआवजे को लेकर देश में काफी हो-हल्ला हो चुका है। ऐसे सारे प्रकरण भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में बाधक बनते हैं जबकि विदेशी निवेशकों का अधिकतर पैसा यहां संस्थागत निवेश के नाम पर सट्टेबाजी के लिए आता है। व्यापार में सुगमता के मुद्दे पर एक दूसरी बाधा भ्रष्टाचार के रूप में विद्यमान है। ट्रांसपैरेंसी इंटरनेशनल नामक संस्था भ्रष्टाचार का रिपोर्ट कार्ड बनाती है उसमें भी भारत की स्थिति अच्छी नहीं है। यह संस्था भी जहां तक मेरा अनुमान है वैश्विक पूंजी घरानों के द्वारा ही संचालित हैं। इस स्थिति में भारत में विदेशी पूंजी आए तो कैसे आए? जीएसटी बिल व्यापार सुगमता में सहायक हो सकता है, इससे कार्पोरेट घराने भी खुश होंगे और वे ताकतें भी जो देश को मिश्रित अर्थव्यवस्था से मुक्त कर पूरी तरह से पूंजीवादी व्यवस्था लाना चाहेंगी।
यह तो भविष्य ही बताएगा कि मेरा सोचना किस हद तक सही है, लेकिन जीएसटी बिल पारित होने के तमाम घटनाचक्र में मुझे कुछ बातें अटपटी और अस्वीकार्य लगीं। प्रथमत: जीएसटी को मनी बिल के रूप में लाया जाना संसदीय परिपाटी के विपरीत था। ऐसा करके सरकार ने राज्यसभा के बहुमत का तिरस्कार किया। दूसरे 30 जून की अर्धरात्रि को संसद के सेंट्रल हॉल में एक विशेष आयोजन करना और उसके लिए संसद भवन को रोशनी में नहलाने का कोई औचित्य नहीं था। जीएसटी यदि स्वागत योग्य है तो भी वह आर्थिक सुधार के एक बड़े कदम से बढ़कर कुछ नहीं है। उसे देश की आर्थिक आज़ादी की संज्ञा देना अतिशयोक्ति का भी अपमान है। यह सरकार नेहरू और गांधी को तो झूठा ठहराने पर तुली हुई है, क्या वह 1947 को मिली आज़ादी को भी झूठा साबित करना चाहती है?
देशबंधु में 06 जुलाई 2017 को प्रकाशित 

Wednesday, 28 June 2017

कुछ इंदौर, कुछ उज्जैन

                                      

 मध्यप्रदेश के सबसे बड़े शहर तथा वाणिज्यिक राजधानी इंदौर को लंबे अरसे से 'लिटिल बॉम्बे’ के विशेषण से नवाजा जाता रहा है। इंदौर की समृद्धि के सामने मध्यप्रदेश के बाकी नगर फीके पड़ते थे। यद्यपि विगत पच्चीस-तीस वर्षों में यहां जो तथाकथित विकास अंधाधुंध रफ्तार से हुआ है उसके चलते मुझे इंदौर एक भीड़ और चीख-चिल्लाहट से भरा शहर लगने लगा था। लेकिन अभी दस दिन पहले इंदौर गया तो नगर का एक नया रूप देखने मिला। इंदौर के नागरिक प्रशासन और नागरिक समाज दोनों ने मिलकर एक बेहतरीन काम किया है कि आज इंदौर की गिनती देश के सबसे स्वच्छ नगरों में होने लगी है। आप कहीं भी निकल जाइए, कचरे का कहीं नामोनिशान नहीं दिखता, सड़कों पर आवारा मवेशी बिल्कुल नज़र नहीं आते, सड़क पर बैठी गाय-भैंस आपका रास्ता नहीं रोकतीं, सड़कों के किनारे अनेक स्थानों पर शौचालय बना दिए गए हैं जो इस्तेमाल में आते हैं। नगरवासी गर्व के साथ बताते हैं कि उनके शहर को स्वच्छ भारत अभियान में प्रधानमंत्री से प्रथम पुरस्कार मिला है। मैं समझता हूं कि उनका यह गर्व उचित है।
इंदौर को पश्चिमी मध्यप्रदेश अर्थात मालवा की राजधानी भी कहा जा सकता है। 1956 में बने नए मध्यप्रदेश की राजनीति में इंदौर का वर्चस्व लंबे समय तक रहा। मुख्यमंत्री किसी भी क्षेत्र का रहा हो उसके लिए इंदौर की उपेक्षा करना संभव नहीं था। वर्तमान मुख्यमंत्री शिवराज सिंह भी उसी परिपाटी का पालन कर रहे हैं। उन्होंने अपनी तरफ से इंदौर का ध्यान रखने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। शायद इसलिए स्वच्छता में प्रथम आने की बात हो या अन्य किसी विकास योजना की, आम जनता से मुख्यमंत्री की तारीफ ही सुनने मिलती है। इंदौर में सत्तारूढ़ दल के जो प्रमुख नेता हैं उनके प्रति जनता की भावना कुछ अलग है। यहीं पर एक पेंच आ गया है। मध्यप्रदेश में भाजपा के पहले तीन मुख्यमंत्री मालवा से ही थे। सुश्री उमा भारती बुंदेलखंड और बाबूलाल गौर भोपाल का प्रतिनिधित्व करते थे किन्तु उनका कार्यकाल लंबा नहीं चला अत: उनकी भूमिका भी उल्लेखनीय नहीं रही। अब शिवराज सिंह को कुर्सी पर बैठे ग्यारह साल हो गए हैं तो मालवा के कद्दावर नेताओं की आंख की किरकिरी बन गए हैं। विधानसभा चुनावों के लिए मात्र डेढ़ साल का वक्त बाकी है; अभी कुर्सी मिल जाए तो ठीक वरना कौन जाने आगे मौका मिलेगा या नहीं।
हमें इंदौर एक दिन रुककर उज्जैन जाना था। मित्रों ने प्रसन्नता के साथ सूचित किया- कोई परेशानी नहीं, बस पचास किलोमीटर तो है, एक घंटे में पहुंच जाएंगे। कोई हड़बड़ी मत कीजिए। हमने उनकी बात मान ली। शहर से निकलकर हाईवे तक आने में जो भी समय लगा हो, उसके बाद तो चालीस-पैंतालीस मिनट में सफर तय हो गया। शहर के भीतर एक एक्सप्रेस-वे है इस पर टोल टैक्स का नाका पड़ता है। हमारे टैक्सी ड्राइवर ने टोल नहीं पटाया। उसने बताया कि यह नाका अवैध रूप से चल रहा है। सरकार इसे बंद कर चुकी है। इंदौर वाले इस बात को जानते हैं, लेकिन बाहर की नंबर प्लेट देखकर नाकेदार वसूली कर लेते हैं। उसने भाजपा के एक बड़े स्थानीय नेता का नाम लिया कि अवैध वसूली में चालीस परसेंट हिस्सा उनको जाता है। उन नेता की शहर में और कहां-कहां हिस्सेदारी है, क्या-क्या जमीन-जायदाद हैं, यह रहस्योद्घाटन भी उसने किया। एक तरफ इंदौर की सड़कों की स्वच्छता, दूसरी तरफ राजनीति की मलीनता, दो विरोधाभासी तथ्य उजागर हुए। लेकिन टैक्सी ड्राइवर ने जो बात बताई वह तो आज की कड़वी सच्चाई है और सर्वव्यापी है। इसकी सफाई कैसे होगी, पता नहीं।
इंदौर से आगे बढऩे पर उज्जैन जैसे-जैसे पास आते जाता है राजमार्ग के दोनों किनारे नए-नए बने होटल और रिसोर्ट नज़र आने लगते हैं। एक-एक रिसोर्ट कई-कई एकड़ में फैला और अल्प प्रवास के लिए आवश्यक सारी सुविधाएं एसी कमरे, बड़े-बड़े हाल, रेस्तोरां, लॉन, सौ गाडिय़ां खड़ी हो जाएं इतनी बड़ी पार्किंग और हां, स्वीमिंग पूल भी। इनमें से अधिकतर का निर्माण सिंहस्थ-2016 को ध्यान में रखकर किया गया था। मध्यप्रदेश सरकार बारह साल में एक बार पड़ने वाले इस पर्व को अभूतपूर्व रूप से मनाने की तैयारी में जुटी हुई थी। मुख्यमंत्री स्वयं हर दूसरे-तीसरे दिन उज्जैन पहुंच जाते थे। इन होटलों का निर्माण जाहिर है कि विशिष्ट तीर्थयात्रियों को ध्यान में रखकर किया होगा। सिंहस्थ पर्व समाप्त होने के बाद भारी निवेश से निर्मित संपत्ति का क्या होता तो ये होटल या रिसोर्ट अब शादी-ब्याह के प्रयोजन में काम आ रहे हैं। इंदौर के आसपास जो विवाह घर तथा मैरिज लॉन आदि हैं वे बहुत महंगे हैं। इंदौर के परिवार भी इसलिए अब यहां आकर पारिवारिक समारोह आयोजित करने लगे हैं।
हम भी परिवार में एक विवाह के सिलसिले में उज्जैन गए थे। इन्हीं में से किसी एक रिसोर्ट में ठहराए गए थे। यहां ठहरने के दो लाभ मिले। एक तो शहर के शोरशराबे और भागमभाग से मुक्ति मिली तो विवाह में आए पारिवारिक सदस्यों के साथ मिलने का, बात करने का पर्याप्त से अधिक अवसर मिल गया। दूसरे उज्जैन नगर कुछ किलोमीटर की ही दूरी पर था तो तीर्थ यात्रा का पुण्य कमाने का योग भी बन गया। उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में सुबह चार या पांच बजे भस्म आरती होती है। आधी रात को किसी ताजी चिता की भस्म लाकर ज्योतिर्लिंग का लेपन होता है और फिर आरती। इस दुर्लभ दर्शन के लिए लिए रात बारह बजे से श्रद्धालु कतार में लग जाते हैं और चार-पांच घंटे खड़े रहकर अपनी बारी आने की धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करते हैं। हमारे बीच भी ऐसे उत्साही धर्मप्रवण सदस्यों की कमी नहीं थी जो आधी रात को उज्जैन गए और सुबह दर्शन करके लौटे। उन्हें इस अनुभव से जो आत्मिक शांति मिली होगी वह उनके प्रफुल्लित मुखानन पर साफ देखी जा सकती थी। मुझ जैसे सांसारिक प्राणी को यह कष्ट उठाना गवारा न था।
मुझे यहां बिलासपुर की दिवंगत कथा लेखिका सुश्री शशि तिवारी की एक कहानी का स्मरण हो आया है। उन्होंने लिखा था कि महाकाल के दर्शन एक बार में पूरे नहीं होते। वे अपने धाम में तीन बार बुलाते हैं। यह तो लोक मान्यता हुई। मैं शायद पांचवीं-छठवीं बार उज्जैन जा रहा था। महाकाल के पहले पहल दर्शन 1957 में बाबूजी के साथ किए थे। उसके बाद संयोग नहीं बना। इस बार दर्शन के लिए पहुंचा तो मेरे लिए सब कुछ नया ही था। तीर्थयात्रियों की हर साल बढ़ती हुई संख्या को ध्यान में रखकर मंदिर परिसर का विस्तार और साथ-साथ नवनिर्माण भी हुआ है। दर्शन करने के लिए लगभग आधा किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है और बाहर आने में भी उतनी ही दूरी तय करना पड़ती है। पहले गर्भगृह तक जा सकते थे, अब कुछ मीटर दूरी से दर्शन करना पड़ते हैं। दर्शन पथ में मंदिर का इतिहास कहीं-कहीं उत्कीर्ण है। एक प्रस्तर फलक पर उज्जैन के अनन्य विद्वान पंडित सूर्यनारायण व्यास के हवाले से उल्लेख है कि इस मंदिर का अकबर, जहांगीर, शाहजहां और औरंगजेब सबने राजकोष से पोषण किया और जागीरें दीं। जहांगीर ने तो एक दिन में यहां साढ़े तीन हजार स्वर्ण मुद्राएं लुटाईं। यह इतिहास का वह पृष्ठ है जिसे हम संकीर्ण मतवाद के चलते जान-बूझ कर भूल जाना चाहते हैं।
उज्जैन यूं तो महाकाल की नगरी के रूप में प्रसिद्ध है, किन्तु सच पूछा जाए तो यह नगर ही मंदिरों का है। किसी समय वेगवती क्षिप्रा इस नगर की सीमा पर से बहती थी, वह लगभग सूख चुकी है और नर्मदा से पानी लाकर क्षिप्रा की प्यास बुझाई जा रही है। इसी तरह यहां पुरातात्विक महत्व के अनेक प्राचीन मंदिर हैं किन्तु उनका मूल स्वरूप भी क्षिप्रा की जलधारा की तरह खो चुका है। महाकालेश्वर हो या अन्य मंदिर, सबमें संरक्षण या सुविधाएं जुटाने के नाम पर जो परिवर्तन किए गए हैं उनके नीचे मंदिरों का प्राचीन सौंदर्य दब गया है। राजा विक्रमादित्य की कुलदेवी हरसिद्धि के मंदिर में एक प्राचीन बावली है, जिसे लोहे के दरवाजे में बंद कर सामने बड़ा सा ताला लगा दिया गया है। मराठाकालीन दो भव्य दीप स्तंभ ही एक तरह से मंदिर की प्राचीनता का परिचय देते हैं।
एक मंदिर दुर्गा के स्वरूप गढ़कालिका का है, जो महाकवि कालिदास की आराध्य देवी थीं। यहां परिक्रमापथ में तीन सुंदर प्रस्तर फलक हैं, जिनमें कुछ कथाएं उत्कीर्ण हैं। ये फलक निश्चित रूप से हजार-आठ सौ साल पुराने होंगे किन्तु सिंदूर पोतकर इनकी सुंदरता नष्ट कर दी गई है। उज्जैन में ही सांदिपनी आश्रम है, किन्तु प्राचीन युग के उस गुरुकुल का कोई भी अवशेष वहां नहीं है। श्रद्धालुओं के लिए यही जानना पर्याप्त है कि कृष्ण-बलराम और सुदामा यहां पढ़े थे। भर्तृहरि की गुफा अपनी जगह पर सुरक्षित है, लेकिन वह नाथ संप्रदाय के नवनिर्मित मठ के घेरे में आ गई है। मंदिरों के इस विशाल समुच्चय में कालभैरव का अलग ही स्थान है। कालभैरव को महाकाल का सेनापति माना जाता है। यहां रोचक तथ्य है कि देवप्रतिमा को मदिरा का भोग लगाया जाता है। भक्तजन अपनी पसंद की मदिरा की बोतल लेकर आते हैं, पुजारी उसमें से कुछ हिस्सा निकालकर बोतल वापिस कर देते हैं जिसका आचमन भक्त बाद में करते होंगे! अगर मंदिर पाटलिपुत्र में होता तो क्या होता।
देशबंधु में 29 जून 2017 को प्रकाशित 

Friday, 23 June 2017

शिक्षा और परीक्षा-2



 पिछले सप्ताह इसी विषय पर चर्चा करते हुए मैंने शिक्षा जगत में स्वायत्तता की बात की थी। इसके साथ-साथ मेरा यह भी मानना है कि भारत जैसे अपार विविधता वाले देश में शिक्षा का विकेन्द्रीकरण भी होना चाहिए। आज जो माहौल है उसे देखते हुए ये दोनों बातें धारा के विपरीत मानी जाएंगी। लेकिन हर समय धारा के साथ बहने में समझदारी नहीं होती। एक तरफ तो हमारे सामने सुभाषित है कि- विद्या मनुष्य को विमुक्त करती है और दूसरी तरफ उसे अनेक तरह के बंधनों में जकडऩे की कोशिश की जा रही है।संस्कृत का यह सुभाषित 'सा विद्या या विमुक्तये न जाने कितने शिक्षण संस्थानों में ध्येय वाक्य के रूप में लिखा होता है, किन्तु इसका पालन करने में किसी की रुचि दिखाई नहीं देती। हम ऋग्वेद की सूक्ति का भी ध्यान करें जिसमें प्रार्थना की गई है कि विश्व की सभी दिशाओं से उत्तम विचारों को हम तक आने दें। जब ज्ञान देने वाली संस्थाओं को सत्ता की प्राचीरों में कैद कर दिया जाएगा तो उत्तम विचार कहां से आएंगे?
मैं पिछले कई दशकों से देख रहा हूं कि शिक्षा में प्रगति और नवाचार के नाम पर जो नित नए निर्णय और प्रयोग हो रहे हैं उनसे देश में संस्थागत शिक्षा के स्तर में निरंतर गिरावट आ रही है। जब शासन द्वारा अनुमोदित शिक्षा व्यवस्था से हटकर अन्यत्र नए प्रयोग होते हैं तो वे भी देखते ही देखते हुक्मरानों को नागवार गुजरने लगते हैं। सच पूछा जाए तो हमारे देश में शिक्षातंत्र वर्गभेद और वर्णभेद को मिटाने के बजाय उसे पुख्ता करने का काम कर रहा है। यहां एक उदाहरण देना प्रासंगिक होगा। देश की राजधानी दिल्ली में संस्कृति विद्यालय नाम का एक निजी स्कूल है। इस शाला में आम जनता के प्रवेश की कोई गुंजाइश नहीं है। यहां मुख्यत: आईएएस तथा अन्य उच्च सेवाओं में पदस्थ अफसरों के बच्चे ही दाखिला ले सकते हैं। ठीक है आप बड़े आदमी हैं, अपने बच्चों के लिए आपने सबसे अलग एक स्कूल बना लिया है, लेकिन फिर केन्द्र सरकार उच्चवर्ग के इस स्कूल के लिए भी तीन करोड़ रुपया या उससे अधिक की सालाना ग्रांट क्यों देती है?
कुछ दिन पहले फेसबुक पर एक सज्जन ने माकूल टिप्पणी की कि सरकारी नौकरियां सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के लिए आरक्षित होना चाहिए, जबकि जिनके बच्चे प्राइवेट स्कूलों में पढ़ रहे हैं वे प्राइवेट सेक्टर में काम करें। इस पर एक अन्य सज्जन की टिप्पणी आई कि सरकारी स्कूलों के हाल बेहाल हैं पहले उन्हें दुरुस्त कीजिए। मैं भी यही कह रहा हूं। अगर हमारे राजनेताओं और अफसरों के बच्चे निजी संस्थानों में पढ़ेंगे तो सरकारी स्कूलोंकॉलेजों पर कौन ध्यान देगा। जो लोग  सरकार का नमक खा रहे हैं उन्हें तो सबसे पहले सरकार द्वारा स्थापित संस्थाओं में ही अपनी संतानों को भेजना चाहिए। सत्ताधीश ऐसा नहीं करते क्योंकि वे आम  जनता से दूरी बना कर रखना चाहते हैं। यह स्थिति उस समय नहीं थी जब मैं स्कूल में पढ़ता था। मेरे सहपाठियों में जिला कलेक्टर का बेटा था, तो गुड़पट्टी बनाने वाले एक मामूली से कारीगर का बेटा भी। हम दोस्तों के बीच कोई भेदभाव नहीं था, सब एक-दूसरे के घर आते-जाते थे, साथ-साथ खेलते-कूदते थे, लड़ते-झगड़ते थे, टिफिन भी मिल -बांट कर खाते थे।
शिक्षा जगत में जब बड़ी हद तक स्वायत्तता का माहौल था तो समाज में शिक्षकों का सम्मान भी होता था। यह सही है कि कुछ लोग इस स्वायत्ता से की गई अपेक्षा पर खरे न उतरकर उसका दुरुपयोग करते थे। उनका प्रतिशत बहुत कम था, परंतु ऐसा करने वालों ने नीति-निर्माताओं को बहाना दे दिया कि वे शिक्षा क्षेत्र में हस्तक्षेप करने लगे। इसका दुष्परिणाम सामने है।  विश्वविद्यालय का उपकुलपति, महाविद्यालय का प्राचार्य और विद्यालय का प्रधानाध्यापक अपने-अपने स्तर पर ये सम्मान के पात्र होते थे।
जनता की निगाहों में इनका ओहदा कमिश्नर, कलेक्टर या मंत्री से कम नहीं होता था। पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर के संस्थापक कुलपति डॉ. बाबूराम सक्सेना के बारे में प्रसिद्ध है कि वे मुख्यमंत्री द्वारिकाप्रसाद मिश्र के रायपुर आगमन पर उनकी अगवानी करने विमानतल नहीं गए। जब मिश्र जी ने संदेश भेजकर उन्हें सर्किट हाउस बुलाया तभी वे उनसे मिलने गए। आज तो स्थिति यह है कि  कलेक्टर के सामने वाइस चांसलर की भी कोई हैसियत नहीं रही है। भले ही हिन्दी पर्यायवाची उपकुलपति के बजाय कुलपति क्यों  हो गया हो।
यह इसलिए हो रहा है क्योंकि विधानसभा में बैठकर जो नीतियां बना रहे हैं और मंत्रालय में बैठकर जो निर्णय ले रहे हैं वे अपने बच्चों को सरकारी स्कूल-कॉलेज में पढ़ने नहीं भेजते। उनके बच्चे तो धन्नासेठों के बच्चों के साथ देश-विदेश के अभिजात्य से भरे शिक्षण संस्थानों में पढ़ने जाते हैं। हुक्मरानों की इस पीढ़ी के साथ यह दिक्कत भी है कि देश के राजनीतिक इतिहास से इनका परिचय बहुत क्षीण है।  ये जहां पर हैं वहां सिर्फ हुक्म चलाने के लिए बैठे हैं। इनकी नज़रों में शिक्षक की हैसियत एक मुलाज़िम से अधिक नहीं है।
शिक्षक भी हैं कि उनका अधिकतर समय छठवें-सातवें वेतन आयोग की ओर लगा रहता है, कई शिक्षकों का मन तो उसमें भी नहीं भरता और वे धनोपार्जन के लिए हर तरह से जुटे रहते हैं। ऐसे शिक्षकों की संख्या दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। इन्हें शिक्षातंत्र की स्वायत्तता से कोई मतलब नहीं है। अपना काम बन जाए उतना ही काफी है। एकजुटता और संघर्ष के रास्ते पर चलना इन्हें गवारा नहीं है।
यही कारण है कि शिक्षा क्षेत्र में तुगलकी फैसले होते हैं और उन पर कोई सवाल खड़ा नहीं होता। कोठारी कमीशन की रिपोर्ट  पचास साल से ऊपर हो गए। सरकार और शिक्षक दोनों में उसे लागू करने की कोई प्रतिबद्धता नहीं थी तो रिपोर्ट जहां की तहां धरी  गई। आज यदि विश्व में हमें सचमुच अपना रुतबा कायम करना है तो उसके लिए सबसे पहली शर्त शिक्षा में स्वायत्तता लाने की है। सरकार को अपनी भूमिका सहस्राब्दी लक्ष्य और उसके बाद आए टिकाऊ विकास लक्ष्य के अंतर्गत किए गए वादे को पूरा करना तक सीमित रखना चाहिए। आप जीडीपी का छह प्रतिशत शिक्षा पर खर्च करें; यह खर्च कैसे हो, उसकी योजना कैसे बने, कहां कैसे स्कूल-कॉलेज की आवश्यकता है। ये सारे निर्णय शिक्षा विशेषज्ञ लें और इस हेतु समाज के साथ व्यापक परामर्श किया जाए। यह नहीं कि जहां मंत्रीजी का मन हुआ वहां स्कूल खोलने की घोषणा कर दी। इस तरह की सस्ती लोकप्रियता के मोह से हमारे नेताओं को बचना चाहिए।
यह देखकर कौतुक होता है कि मंत्री और अफसर जब मन आए तब किसी सरकारी शाला में क्लास लेने पहुंच जाते हैं। आप निरीक्षण करने जाएं वहां तक तो ठीक है, लेकिन बच्चों को पढ़ाना आपका काम नहीं है और न ही आप इसके लिए प्रशिक्षित हैं। यह सवाल भी उठता है कि आप किसी प्राइवेट स्कूल में जाकर क्लास क्यों नहीं लेते? इसी तरह का काम कुछ समाजसेवी संस्था भी करती हैं। वे अपने सदस्यों से कहती हैं कि खाली समय में जाकर स्कूल में पढ़ाएं। इन्हें नहीं पता कि पढ़ाने की भी एक सुचारु विधि होती है। आपके मन में सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले गरीब बच्चों के प्रति इतना ही दर्द है तो स्कूलों   में नियमित शिक्षक की व्यवस्था करवा दीजिए। उन बच्चों की दुआएं  आपको मिलेंगी। मेरा मानना है कि जैसे शेर जंगल का राजा होता है एक प्राचार्य या प्रधानपाठक को भी अपने संस्थान में उसी रौब के साथ रहना चाहिए। प्रोफेसर उमादास मुखर्जी, प्रोफेसर एसडी मिश्रा, प्रोफेसर रणवीर सिंह शास्त्री जैसे व्यक्ति आदर्श के रूप में हमारे सामने हैं।
मैंने जैसा कि शुरू में कहा हमारे बहुविध देश में शिक्षा का विकेन्द्रीकरण होना भी आवश्यक है। अभी विश्वविद्यालय अनुदान आयोग तथा विभिन्न नियामक संस्थाओं द्वारा पाठ्यक्रम के बारे में जो व्यवस्था की गई है वह कतर्ई संतोषजनक नहीं है। सुना है कि वर्तमान व्यवस्था को और कड़ा किया जा रहा है अगर ऐसा हुआ तो यह दुर्भाग्यपूर्ण होगा। दिल्ली में बैठकर पूरे देश के बारे में एकसार फैसले किसी भी मामले में लेना वांछित नहीं है। शिक्षा के मामले में तो बिल्कुल नहीं। इसी तरह भोपाल या रायपुर में बैठकर भी समूचे प्रदेश के बारे में निर्णय लेने को मैं उचित नहीं मानता।
प्राथमिक शाला स्तर पर बुनियादी पढ़ाई में किसी सीमा तक एकरूपता हो सकती है, लेकिन वहां भी पूरी तरह से नहीं। किसी जिले में स्कूलों में क्या पढ़ाया जाए, यह निर्णय वहां का स्कूल बोर्ड करे, विश्वविद्यालय में वहां के कुलपति और अध्यापक मिलकर तय करें और फिर इतनी निगरानी रखी जाए कि विद्यालय, महाविद्यालय अथवा यूटीडी के परिणाम कैसे आ रहे हैं। उसमें अगर कमजोरी दिखे तो संस्थाप्रमुख उसके लिए जवाबदेह हो। लेकिन ऊपर बैठकर सरकार सबको एक ही लाठी से हांकने की कोशिश करे तो इसका प्रतिकार करना आवश्यक है।

देशबंधु में 22 जून 2017 को प्रकाशित 

Wednesday, 14 June 2017

शिक्षा और परीक्षा



एक कोई वक्त था जब 31 मार्च तक सारी परीक्षाएं निपट जाती थीं। शालाओं के परीक्षाफल 30 अप्रैल तक और विश्वविद्यालय के मई के दूसरे सप्ताह तक घोषित हो जाते थे। विद्यार्थियों को मई-जून दो माह का पूरा अवकाश मिलता था, जिसका सदुपयोग करने के लिए बहुत सी योजनाएं होती थीं। बहुत से बच्चे अपने गांव या मामा गांव जाते थे, एक नया माहौल जिसमें सीखने के लिए काफी कुछ होता था, जिनको सुविधा होती थी वे देशाटन पर जा सकते थे और कुछ नहीं हुआ तो गर्मी की दोपहरें घर के भीतर परिवार के सदस्यों तथा मित्रों के साथ भांति-भांति के खेल खेलने में बीत जाती थीं।जिन्हें पढऩे का शौक होता था वे लाइब्रेरी से किताबें लेकर आ जाते थे। यही समय खासकर उत्तर-भारत में शादियों का सीजन होता था तो उसका आनंद भी घराती या बराती बनकर बच्चे उठाते थे। कुल मिलाकर छुट्टियों के दिन, छुट्टियों की तरह बीतते थे जिसका बेहद मनोरंजक चित्र अजीत कुमार ने अपने लघु उपन्यास 'छुट्टियां’ में किया है।
उस बीते हुए समय की तुलना में आज का दृश्य देखता हूं तो कोफ्त होने के साथ-साथ गुस्सा भी आने लगता है। एक तरफ लगता है कि हमने अपनी शिक्षा व्यवस्था का मजाक बनाकर रख दिया है, तो दूसरी तरफ यह देखकर मन को पीड़ा होती है कि हमने कैसे अपने युवजनों को मशीन में तब्दील कर दिया है। एक तो वैसे ही साल भर परीक्षाएं होते रहती हैं, कभी वीकली टेस्ट, कभी मंथली टेस्ट, कभी प्रोजेक्ट वर्क, कभी कुछ और।बच्चों को अपने लिए मानो समय ही नहीं मिलता। फिर मां-बाप के सपने कि उनकी संतान सर्वगुण सम्पन्न हो, जो पढ़ाई में अव्वल, खेलकूद में सबसे आगे और नृत्य, संगीत, चित्रकला सबमें प्रवीण हो। स्कूल में होमवर्क दे दिया जाता है, उसका बोझ तो रहता ही है, ऐसे में हॉबी क्लास के लिए समय कब निकले, तो अक्सर शनिवार, रविवार का अवकाश उसकी भेंट चढ़ जाता है। अब पहले वाली बात तो है नहीं कि एक तिमाही, एक छमाही और एक वार्षिक परीक्षा में काम चल जाए। तब हॉबी पूरी करने के लिए भी समय मिल जाता था और खेलकूद तो स्कूल शिक्षा का अंग ही था।
जब हम पढ़ रहे थे, इंजीनियरिंग कॉलेज, मेडिकल कॉलेज, आईआईटी, आईआईएम तब भी थे। सिविल सर्विसेस की परीक्षाएं भी होती थीं, जिनकी अभिलाषा उस ओर होती थी, वे उसकी तैयारी करते थे। लेकिन अभी जैसी आपाधापी मची है इसकी कल्पना हमने नहीं की थी। शायद जमाना आगे निकल गया है और मुझ जैसे लोग पीछे रह गए हैं।ऐसा नहीं कि आज से साठ साल पहले सब कुछ अच्छा ही अच्छा था। परीक्षाओं में नकल होती थी, नकलची छात्र झगड़ा करने पर उतारू भी होते थे, कितने सारे साथी परीक्षा के दिनों में हनुमानजी के मंदिर पर मत्था टेकने जाते थे, फेल होने पर छात्रों द्वारा आत्महत्या करने के दु:खद प्रसंग भी सामने आते थे, कई बार गुंडानुमा छात्र भी छात्रसंघ का अध्यक्ष बन जाते थे। इस सबके बावजूद सामाजिक ताना-बाना काफी मजबूत था और नौजवानों में अपने भविष्य को लेकर इतनी अधिक दुश्चिंता और हताशा नहीं थी। एक विश्वास था कि सब कुछ समाप्त नहीं हो गया है। उस समय न तो बुजुर्ग पीढ़ी आत्मकेन्द्रित थी और न नई पीढ़ी। समाज में सामूहिकता की एक छाया थी, जिसमें ठहरने का वक्त मिल जाता था।
मैं अभी देख रहा हूं कि एक तरफ वार्षिक परीक्षाओं के नतीजे आ रहे हैं और दूसरी ओर विद्यार्थी हर दूसरे दिन एक नई परीक्षा देने की चिंता में दुबले हुए जा रहे हैं। यह सुनने में ही विचित्र लगता है कि परीक्षा में आजकल सौ प्रतिशत तक अंक मिल रहे हैं। देश की राजधानी के कॉलेजों में कटऑफ होता है जिसके तहत तिरानबे-चौरानबे प्रतिशत से कम अंक पाने वाले विद्यार्थियों को दाखिला ही नहीं मिल पाता। यह परीक्षापद्धति अपनी समझ में नहीं आती। बताते हैं कि आजकल ऑब्जेक्टिव मैथड से परीक्षा ली जाती है। होती होगी।इस तरह के प्रयोगों के चलते परीक्षा में बैठने वाले बच्चों का खाना-पीना तक मुहाल हो जाता है। साल भर तैयारी करते रहो, चार विकल्प में से एक उत्तर सही है उसे याद करो, और अपना पूरा दिमाग उसी में लगा दो। मैं नहीं जानता कि इसमें विद्यार्थियों के स्वतंत्र मानसिक विकास का कितना अवसर होता है। वे इस कठिन परीक्षा पद्धति की तैयारियों के बीच देशकाल के बारे में कितना ज्ञान हासिल कर पाते हैं। उनके कोमल हृदय का रस कहीं ये परीक्षा पद्धति सोख तो नहीं लेती है?
एक बात समझ आती है कि देश में बहुत सी अन्य बातों के साथ शिक्षा जगत में भी जो परिवर्तन नज़र आते हैं उसका बहुत कुछ श्रेय नवपूंजीवादी विश्वव्यवस्था को है। कभी-कभी महसूस होता है कि सारी दुनिया जैसे किसी दौड़ में भाग ले रही है, एक के पीछे एक लोग भागे जा रहे हैं, क्यों, कहां, किसलिए यह शायद किसी को पता नहीं। आजकल तो हर किसी मौके पर दौड़ों का आयोजन होने लगा है- रन फॉर दिस, रन फॉर दैट, शायद इसी सोच का प्रतिबिंब है।इधर हाल में बहुत सी कॉमेडी फिल्में आई हैं जैसे वेलकम आदि। उनमें भी सब लोग इसी तरह यहां से वहां दौड़ लगाते नज़र आते हैं, लेकिन अंत में हासिल कुछ नहीं होता। ये फिल्में भी एक तरह से इस नई सोच को ही दर्शाती हैं। अब चूंकि भारत भी विश्व ग्राम का अंग बन चुका है, जिसका पहला प्रमाण हमारे सामने पुराने गुडग़ांव और नए गुरुग्राम के रूप में सामने है, तो स्वाभाविक ही हम दौड़ में किसी से पीछे नहीं रहना चाहते। इसका परिणाम है कि शिक्षा का निजीकरण प्रत्यक्ष और परोक्ष दोनों रूपों में हो रहा है। बहुत सारे निजी विश्वविद्यालय, महाविद्यालय, तकनीकी संस्थान इत्यादि प्रत्यक्ष उदाहरण हैं किंतु परोक्ष निजीकरण का मामला एकदम से समझ नहीं आता।
शिक्षा के क्षेत्र में एकाएक कितनी तो परामर्शदात्री एजेंसियां काम करने लगी हैं। वे बताती हैं कि देश की शिक्षा व्यवस्था को विश्व स्तर पर लाने के लिए आपको क्या करना चाहिए। उनके ब्रीफकेस में आपके लिए अनगिनत प्रोजेक्ट रिपोर्टें हैं। मसलन, बिना अध्यापकों के शिक्षा संस्थान को कैसे चलाएं, इंटरनेट की सहायता लेकर ऑनलाइन पढ़ाई कैसे की जाए, वर्चुअल क्लासरूम क्या है, ई-क्लासें कैसे चलती हैं, संस्था की ग्रेडिंग क्यों और कैसे हो, पाठ्यक्रम में क्या तब्दीली लाई जाए, नैक, नैट, स्लेट, जीईई मेन, जीईई एडवांस जैसे फार्मूले एक के बाद एक भानुमति के पिटारे से निकलते रहते हैं।मंत्रालय में बैठे अफसर इन सुझावों से बहुत खुश होते हैं और वे मंत्री के दस्तखत लेकर आदेश जारी कर देते हैं जिन्हें मानना वाइस चॉन्सलर से लेकर प्रायमरी स्कूल के शिक्षाकर्मी तक का पुनीत कर्तव्य बन जाता है।
मुझे लगभग साठ साल पहले लिखी गई किताब का ध्यान आता है। ' अग्ली अमेरिकन’ शीर्षक इस पुस्तक में व्यंग्य में बताया गया था कि कैसे अमेरिकी विशेषज्ञ किसी विकासशील देश में आकर वहां के लोगों को मुर्गीपालन कैसे किया जाता है सिखाते हैं। उस समय वैश्वीकरण का यह दौर प्रारंभ नहीं हुआ था, लेकिन यह पुस्तक उसका एक प्रारंभिक संकेत देती है। आज वही सब हो रहा है। भारत के स्कूल कैसे चलें, कॉलेजों में पढ़ाई कैसे हो, तकनीकी संस्थानों की क्या भूमिका हो, यह सब नवपूंजीवाद के पंडे-पुरोहित हमें सिखा रहे हैं।भारत में मार्च तक परीक्षाएं क्यों खत्म हो जाती थीं, उसके पीछे क्या कारण था, इसे बिना समझे हमने शिक्षा सत्र की समय सारिणी बदल दी, परीक्षा लेने के जो सीधे-सरल तरीके थे, उनको अनावश्यक रूप से दीर्घ सूत्रीय और जटिल बना दिया, बच्चे बचपन में ही सारा ज्ञान हासिल कर लें, इसलिए उन पर भारी-भरकम बस्ते का बोझ लाद दिया और भी न जाने क्या-क्या...
इस सबमें सबसे अधिक नुकसान हुआ है शिक्षा संस्थानों की स्वायत्तता का और साथ-साथ शिक्षकों की प्रतिष्ठा का। विद्यार्थियों का नुकसान तो कई तरह से हो ही रहा है। मेरा पक्का मानना है कि अगर हमें अपनी नई पीढ़ी का सच्चे मन से अच्छा भविष्य बनाना है तो उसके लिए शिक्षा जगत में स्वायत्ता कायम होगी। कोई भी शिक्षण संस्थान अपने शिक्षकों के बल पर अपनी पहचान बनाता है।  यदि वे शिक्षक  समय राजनीतिक अथवा प्रशासनिक दबाव में रहेंगे तो कभी भी अपना काम ठीक से नहीं कर पाएंगे। विभिन्न स्तरों पर और विभिन्न आयामों में दी जाने वाली शिक्षा की पद्धति व मूल्यांकन का तरीका क्या हो, ऐसे सारे निर्णय शिक्षा संस्थानों के प्रमुख ही आपस में मिलकर तय करें। उसमें लालफीताशाही का दखल न हो यह बहुत आवश्यक है। उन्हें यह स्वतंत्रता होगी तो वर्तमान में विद्यार्थियों के मन मस्तिष्क पर अनुचित दबाव डालने वाली परीक्षा पद्धति से उन्हें मुक्ति मिलेगी और वे निद्र्वन्द्व भाव से अपने भविष्य के बारे में फैसला कर सकेंगे।
देशबंधु में 15 जुलाई 2017 को प्रकाशित