Wednesday, 19 July 2017

स्वास्थ्य सेवाओं की दुर्गति-1


 
केन्द्र सरकार को एक नीतिगत निर्णय लेकर शहरी क्षेत्र में निजी अस्पताल खोलने के लिए बैंक ऋण देने पर पाबंदी लगा देना चाहिए; इस निर्णय का दूसरा पहलू यह होगा कि जो डॉक्टर दूरस्थ अंचलों में जाकर अस्पताल स्थापित करना चाहते हैं उन्हें बैंकों से रियायती दर पर कर्ज उपलब्ध कराया जाए। यह संभवत: एक दु:साहसिक निर्णय माना जाएगा। लेकिन इस कदम से देश के दूरस्थ ग्रामीण अंचलों में स्वास्थ्य सेवाओं की जो बदहाली है उस पर किसी हद तक रोक लग सकेगी। विचार करें तो यह प्रस्ताव पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम की 'पुरा' अवधारणा के काफी करीब है। 'पुरा' याने ग्रामीण क्षेत्रों में शहरी सुविधाओं का विस्तार। यह सबके सामने है कि ग्रामीण क्षेत्रों में डॉक्टरों का बेहद अभाव है। शहर और गांव के बीच जनसंख्या के अनुपात में डॉक्टरों की उपलब्धता में बहुत बड़ा फर्क है। आए दिन खबरें सुनने मिलती हैं कि अस्पताल है तो डॉक्टर नहीं, डॉक्टर है तो नर्स या अन्य सहायक नहीं, वे हैं तो दवाईयां नहीं। हाल-हाल में तो इस बारे में बेहद दर्दनाक समाचार सुनने मिले।
कहीं कोई खेतिहर मजदूर अपनी मृत पत्नी का शव कंधे पर ढोकर पन्द्रह-बीस किलोमीटर पैदल गांव की ओर जा रहा है, तो कोई हाथ ठेले में लाश ले जाने पर मजबूर है; किसी गर्भवती स्त्री को अस्पताल लाना हो तो एक नहीं, अनेक अड़चनें सामने आ जाती हैं। ऐसे ही प्रसंग के चलते दशरथ मांझी पर फिल्म बन गई और उसके नाम की चर्चा विदेशों तक हो गई। ग्रामीण इलाकों से बार-बार सुनने में आता है कि वहां महिला चिकित्सकों की पदस्थापना ही नहीं होती और यदि होती है तो कोई वहां रहना नहीं चाहता है। यह स्थिति सिर्फ एलोपैथिक डॉक्टरों की नहीं है, ग्रामीण इलाकों के आयुर्वेदिक अस्पताल भी, अगर कहीं भगवान है तो उसके भरोसे हैं। कुछ वर्ष पूर्व आदिवासी ग्राम दुगली में (जहां राजीव गांधी एक बार स्वयं पधारे थे।) आयुर्वेदिक अस्पताल का सूना भवन मैंने देखा था। छह बिस्तर का अस्पताल, औषधि कक्ष, निरीक्षण कक्ष, डॉक्टर का निवास, सब कुछ योजनाबद्ध तरीके से निर्मित, लेकिन वहां न डॉक्टर था, न कम्पाउंडर और न ड्रेसर। धमतरी से एक कम्पाउंडर बीच-बीच में आकर सेवाएं देता था।
ऐसे प्रसंग देश के हर जिले में आपको मिल जाएंगे, बहुत ढूंढने की जरूरत नहीं होगी। काफी पहले मध्यप्रदेश में नियम था कि मेडिकल कॉलेज से निकले हर डॉक्टर को ग्रामीण अंचल में दो साल सेवा देनी होती थी। उनसे बाँड भरवाया जाता था। अगर गांव नहीं गए तो बाँड की रकम जब्त हो जाती थी। शुरू में यह रकम भारी लगती होगी, लेकिन रुपए के अवमूल्यन के साथ इसका कोई मोल नहीं रहा और डॉक्टर खुशी-खुशी बाँड की रकम जब्त करवाने लगे। उनका एक तर्क है और वह सही प्रतीत होता है कि अगर गांव में अस्पताल का भवन नहीं है, बिजली-पानी नहीं है, रहने की व्यवस्था नहीं है तो ऐसे में वहां जाकर करेंगे भी क्या? यही तर्क सरकारी स्कूलों के शिक्षक भी देते हैं, लेकिन किसी तहसीलदार, डिप्टी कलेक्टर या कलेक्टर को हमने कभी ऐसे किसी तर्क का सहारा लेते नहीं देखा। विगत वर्षों में देश में बहुत छोटे-छोटे जिले बन गए हैं जहां नाममात्र की सुविधाएं हैं, इसके बाद भी कलेक्टर अपने अमले के साथ वहां रहकर काम करते हैं।
पाठकों ने कुछ दिन पहले समाचार पढ़ा होगा कि छत्तीसगढ़ के आदिवासी जिले बलरामपुर के युवा जिलाधीश अवनीश शरण ने अपनी बेटी का दाखिला वहीं के सरकारी स्कूल में करवाया है। दूसरी ओर हम यह भी जानते हैं कि देश के नक्सल प्रभावित इलाकों में पहले मलकानगिरी के जिलाधीश विनील कृष्ण और बाद में छत्तीसगढ़ में सुकमा के जिलाधीश अलेक्स पाल मेनन का नक्सलियों ने अपहरण किया। इन प्रसंगों का जिक्र मैं एक वृहत्तर परिदृश्य को सामने रखने के लिए कर रहा हूं। अगर अभिजात वर्ग के माने जाने वाले आईएएस अधिकारी कठिनाइयों के बीच रह सकते हैं तो डॉक्टर, अध्यापक या इंजीनियर क्यों नहीं? हां! वे ये मांग अवश्य कर सकते हैं कि जहां उनकी पदस्थापना की जा रही है वहां न्यूनतम सुविधाओं वाला निवास स्थान तो उन्हें मुहैया करवाया जाए। लेकिन फिर मुझे याद आता है कि मैंने बैंक मैनेजरों को सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में काम करते देखा है जहां सुविधा के नाम पर कुछ भी न था और इंजीनियरों के बारे में तो कहा ही जाता है कि वे किसी परियोजना में काम करते हुए तिरपाल वाले टेंट में ही रातें बिताते रहे हैं। बस्तर में जब डीबीके रेलवे लाइन बिछ रही थी तब इंजीनियरों को तंबुओं में रहते हुए मैंने देखा है।
मैं आज के समय में ऐसी घनघोर आदर्शवादी स्थिति की वकालत नहीं करना चाहता। लेकिन सरकार ध्यान दे तो एक अवधारणा को अवश्य अंजाम दिया जा सकता है। इसके लिए शायद कलाम साहब की पुरा योजना को थोड़ा संशोधित करना पड़ेगा। छत्तीसगढ़ में लगभग हर विकासखंड को तहसील का दर्जा मिल गया है। हर तहसील के अंतर्गत कुछ उपतहसीलें भी हैं। क्या यह संभव नहीं है कि उपतहसील वाले कस्बे में शासकीय कर्मचारियों  की एक आवासीय कालोनी बना दी जाए जिसमें शिक्षक, डॉक्टर, राजस्व अधिकारी, इंजीनियर, नर्स इत्यादि सब रहें? वे वहां से अपने स्कूल या अस्पताल तक आना-जाना करें और कोई आपात स्थिति हो तो कुछ ही मिनटों में सहायता उपलब्ध कराई जा सके। यह मोबाइल का जमाना है। गांव-गांव में संचार सुविधा उपलब्ध है। अगर ऐसे संकुलों का निर्माण होता है तो मेरी समझ में ग्रामीण समाज को विशेषकर शिक्षा व स्वास्थ्य संबंधी हर आवश्यक सुविधा अपेक्षाकृत आसानी से उपलब्ध हो सकेगी।
स्वास्थ्य सुविधाओं के संबंध में मेरा दूसरा  सुझाव है कि शासकीय चिकित्सकों की पदस्थापना एक पूर्व-निर्धारित रोस्टर के अनुरूप की जाए और उसमें कोई अपवाद न हो। एक डॉक्टर की पहली पोस्टिंग कम से कम तीन साल के लिए दूरस्थ इलाके में हो। तीन साल बाद उसे किसी अपेक्षाकृत बड़े स्थान पर पोस्टिंग की जाए। जैसे-जैसे उसकी निजी आवश्यकताएं और पारिवारिक जिम्मेदारियां बढ़ें वैसे-वैसे उसकी पदस्थापना उस जगह पर हो जहां पहले के मुकाबले बेहतर सुविधाएं मिल सके। इसे यूं समझें कि एक अविवाहित डॉक्टर भले गांव में रह ले, लेकिन जब उसके बच्चों के कॉलेज जाने का समय आए तो वह ऐसी जगह पर रह सके जहां संतान की पढ़ाई मनमाफिक हो सके। यह रोस्टर फार्मूला अन्य सेवाओं में भी लागू किया जा सकता है। अगर मैं गलत नहीं हूं तो आईएएस और आईपीएस अधिकारियों की पदस्थापनाएं कुछ इसी तरह के फार्मूले के तहत होती हैं। रोस्टर प्रथा को सही रूप से लागू करने में एक अड़चन अवश्य है और वह है राजनैतिक हस्तक्षेप की जो कि बर्दाश्त नहीं होना चाहिए।
हमें इसके साथ बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं देने के लिए एक आधारगत संरचना की आवश्यकता है। देखने में यह आया है कि निर्णयकर्ताओं की मुख्य रुचि निर्माण कार्यों में होती है। इतने करोड़ की यह योजना, उतने करोड़ की वह योजना, इसी का झांसा जनता को बार-बार दिया जाता है। इसका प्रतिकार तो जनता को ही करना है, लेकिन जिन्हें देश-प्रदेश की जिम्मेदारियां संभालने के लिए चुना गया है उन्हें भी तात्कालिक स्वार्थ से हटकर इस बारे में सोचना ही पड़ेगा। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान याने एम्स से लेकर मेडिकल कॉलेज व डिस्ट्रिक्ट हॉस्पिटल होते हुए उपस्वास्थ्य केन्द्र तक एक श्रृंखला कायम हो जाए तो बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं देना संभव हो जाएगा। अधिकतर बीमारियां मौसमी और छोटी-मोटी होती हैं, जिनका इलाज उपस्वास्थ्य केन्द्र में संभव है। मर्ज गंभीर हो तो मरीज को शहर या राजधानी के अस्पताल लाने की आवश्यकता पड़ेगी। इसके पूर्व उपकेंद्र का डॉक्टर वीडियो-वार्ता के माध्यम से प्राथमिक उपचार कर सके आज यह भी संभव है। आशय यह कि चिकित्सा तंत्र व्यवस्थित हो तो डॉक्टर भी बेहतर सेवा करने में समर्थ होगा।
फिलहाल मेरी आखिरी बात निजी और सरकारी क्षेत्र को लेकर है। मेरा मानना है कि सरकारी अस्पतालों को सुदृढ़ करना आवश्यक है। यह सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी है। एसडीजी (सतत विकास लक्ष्य) के अंतर्गत चिकित्सा सेवा पर जीडीपी का तीन प्रतिशत खर्च होना चाहिए। भारत सरकार उसके लिए प्रतिश्रुत है, लेकिन वास्तविकता यह है कि सरकारी क्षेत्र में चिकित्सा सुविधा बदतर हो रही है और निजी क्षेत्र फल-फूल रहा है। उसके अनेक कारण हैं। सरकार को ऐसी युक्ति अपनाना ही होगी जिसमें डॉक्टर ग्रामीण अंचल में जाकर सेवा करने के लिए प्रस्तुत हों। जो डॉक्टर अद्र्ध शहरी या कस्बाई केन्द्रों में निजी अस्पताल खोल कर बैठे हैं वे बता सकते हैं कि वे किसी भी तरह से घाटे में नहीं हैं। मरीज से उन्हें फीस तो मिलती ही है, उन्हें ताजी सब्जियां, अनाज, शहद जैसे उपहार भी कृतज्ञतास्वरूप प्राप्त होते हैं। अर्थात यहां गेंद डॉक्टरों के पाले में है।
देशबंधु में 20 जुलाई 2017 को प्रकाशित