Tuesday, 1 August 2017

स्वास्थ्य सेवाओं की दुर्गति-2


यह अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल की बात है, जब सुषमा स्वराज केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री थीं। उस समय हर प्रदेश में एम्स की स्थापना करने का निर्णय लिया गया था।  परिणामस्वरूप आज लगभग हर प्रदेश में एम्स अस्तित्व में आ गया है। इसके समानान्तर प्रदेशों में नए चिकित्सा महाविद्यालय खोलने की भी पहल की गई। छत्तीसगढ़ में राज्य निर्माण के पूर्व मात्र रायपुर में एक मेडिकल कॉलेज था। आज बिलासपुर, जगदलपुर, रायगढ़ व अंबिकापुर में शासकीय चिकित्सा म.वि. स्थापित हो चुके हैं।  इनके अलावा निजी क्षेत्र में भी कुछ मेडिकल कॉलेज प्रारंभ हुए हैं। दक्षिण भारत व महाराष्ट्र में तो लंबे समय से निजी महाविद्यालय हैं, लेकिन अब अन्य प्रांत भी उनका अनुकरण करने में पीछे नहीं हैं। इनके अलावा डेंटल कॉलेज व नर्सिंग कॉलेज भी बड़ी संख्या में खुले हैं। चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में  हो रहे इस भौगोलिक विस्तार का स्वागत होना चाहिए।  देश की बढ़ती आबादी के अनुपात में यह आवश्यक हो गया है कि आधुनिक व बेहतर चिकित्सा सर्वत्र पहुंचे और उसके लिए उपयुक्त शिक्षा व प्रशिक्षण की व्यवस्था हो। 
यह एक सैद्धांतिक कथन हुआ। व्यवहारिकता के धरातल पर क्या स्थिति है, यह जान लेना उचित होगा। मध्यप्रदेश के भोपाल स्थित एम्स में डायरेक्टर याने संस्था प्रमुख का पद लंबे समय से खाली पड़ा है। रायपुर एम्स के डायरेक्टर डॉ. नितिन नगरकर को ही भोपाल की जिम्मेदारी दे दी गई है, जबकि रायपुर एम्स भी एक नया संस्थान है और यहां की व्यवस्था मुकम्मल होने में काफी कुछ किया जाना बाकी है। भोपाल में स्थापना के समय 27 विभाग थे, जो तीन साल में बढ़कर 41 हो गए हैं, लेकिन उस अनुपात में डॉक्टरों की संख्या बढ़ने के बजाय कम हो गई है। कल्पना की जा सकती है कि जो मरीज इतनी आस लेकर अस्पताल पहुंचते हैं, उन पर क्या बीतती होगी। इससे बदतर हालात राज्य शासन के कॉलेजों के हैं। एक भी म.वि. ऐसा नहीं है, जिसमें चिकित्सा शिक्षकों के सारे पद भरे हों। जब भारतीय चिकित्सा परिषद की निरीक्षण टीम आना होती है तो यहां के डॉक्टरों को वहां ट्रांसफर किए जाने का नाटक खेला जाता है। इस कलाबाजी को आत्मप्रवंचना ही कहना होगा। करोड़ों-अरबों भवन निर्माण व उपकरण खरीद में लग गए, लेकिन भवन सूने हैं और मशीनों में जंग लग रही है। जिनको कमीशन मिलना था, बस वही खुश नजर आ रहे हैं।
मुझे जानकर आश्चर्य होता है कि एम्स में भी डॉक्टर पूरी या पर्याप्त संख्या में नहीं है, जबकि यह देश का सबसे अधिक प्रतिष्ठित चिकित्सा संस्थान है। एम्स के डॉक्टर प्राईवेट प्रैक्टिस नहीं करते। इसका एक प्रमुख कारण बताया जाता है कि उनके निवास कॉलेज परिसर में ही होते हैं। अगर वे निजी तौर पर मरीज देखने लगें तो तुरंत शिकायत हो सकती है। लेकिन शायद इससे बड़ा कारण यह है कि एम्स में काम करते हुए जो सम्मान प्राप्त होता है, वह भारत में अन्यत्र नहीं मिल सकता। जहां तक भौतिक परिलब्धियों याने वेतन-भत्ते का मामला है तो वह भी पर्याप्त और संतोषजनक होता है। एक समय प्रदेश के मेडिकल कॉलेजों के डॉक्टर भी निजी प्रैक्टिस नहीं करते थे। उन्हें इसके लिए एन.पी.ए. (नॉन प्रैक्टिसिंग अलाउंस या गैर-प्रैक्टिस भत्ता) मिलता था। इसमें कुछ कमजोरी परिलक्षित हुई तो कॉलेज में ही पे-क्लीनिक खोल दिए गए। इसमें अपनी ड्यूटी करने के बाद डॉक्टर निजी तौर पर मरीज देख सकते थे और फीस का आधा भाग अस्पताल को उसकी सुविधाओं का लाभ लेने की एवज में दिया जाता था। किंतु ऐसा वक्त आया कि यह व्यवस्था भी ध्वस्त हो गई।
यह लाख टके का सवाल है कि शासकीय चिकित्सा महाविद्यालयों में, शासकीय अस्पतालों में, यहां तक कि एम्स जैसे संस्थान में डॉक्टरों का टोटा क्यों पड़ जाता है। मुख्यत: यह स्थिति विगत पच्चीस-तीस वर्ष के भीतर बनी। ऐसा नहीं है कि उसके पहले प्राईवेट प्रैक्टिस करने वाले डॉक्टर नहीं थे। लेकिन उनकी संख्या बहुत कम होती थी और वे अक्सर बस्ती के धनाढ्य परिवारों का ही इलाज करते थे। यद्यपि पास-पड़ोस के लोग भी उनके पास इलाज के लिए पहुंच जाते थे। इन निजी चिकित्सकों पर मरीजों को लूटने का आरोप भी शायद ही कभी लगा हो। एकाध-दो अपवाद तो हर जगह होते हैं। आम तौर पर जनता सरकारी अस्पताल का ही उपयोग करती थी और वहां के डॉक्टरों को समाज में यथेष्ट सम्मान मिलता था। इसकी सबसे बड़ी वजह थी कि मंत्री, संसद सदस्य, विधायक, संभागायुक्त, जिलाधीश भी अपना और अपने परिवार का इलाज सरकारी अस्पताल के डॉक्टर से करवाने को प्राथमिकता देते थे। जब शासन-प्रशासन के कर्णधार सरकारी अस्पताल में आएंगे तो स्वाभाविक ही वहां की व्यवस्था चाक-चौबंद होगी और डॉक्टर अपने कर्तव्य के प्रति पूरी तरह मुस्तैद।

इधर पिछले कुछ सालों में यह हुआ है कि जो सत्ता में बैठे हैं उनका घमंड सातवें आसमान पर पहुंच गया है। वे बाकी सबको हेय दृष्टि से देखने लगे हैं। फिर चाहे मेडिकल कॉलेज के डॉक्टर हों, या विश्वविद्यालय के कुलपति या बैंक मैनेजर। नए-नए बने कलेक्टर भी अपने से दुगुनी उम्र के लोगों का लिहाज नहीं करते। नेताओं की बदतमीजी का तो कहना ही क्या? इस श्रेष्ठताबोध का परिणाम है कि नेताओं, अफसरों के बच्चे न तो सरकारी स्कूलों में पढ़ते, और न उनके परिवार का इलाज सरकारी अस्पताल में होता है। वे अपने लिए विशेष और पृथक सुविधा की मांग करने लगे हैं। इसका नतीजा सामने है। रायपुर जैसे शहरों में निजी अस्पताल खूब धड़ल्ले से चल रहे हैं। उनके संचालक चांदी काट रहे हैं और रायपुर के मेडिकल कॉलेज अस्पताल में सिर्फ वही पहुंचता है जिसका कोई और सहारा नहीं होता। आज भी अगर हमारे कर्णधार मेडिकल कॉलेज अथवा जिला अस्पताल में जाकर इलाज करवाने लगे तो स्थितियां बदलते देर न लगेगी। दवाईयों की कमी नहीं रहेगी, उपकरण धूल खाते नहीं रहेंगे, स्टाफ ड्यूटी से नदारद नहीं मिलेगा और बड़े नामधारियों के साथ आम जनता को भी राहत मिलने लगेगी।
देवानंद-विजय आनंद की 1971 में फिल्म आई थी- तेरे मेरे सपने। युवा डॉक्टर देवानंद परासिया की कोयला खदान में डॉक्टर बन कर आता है। प्रलोभनवश वह कुछ समय बाद तब की बंबई आज की मुंबई चला जाता है जहां वह फिल्मी सितारों का डॉक्टर बन जाता है। इंग्लैंड के प्रसिद्ध उपन्यासकार और चिकित्सक ए.जे. क्रोनिन के उपन्यास 'द सिटेडल' से यह कहानी उठाई गई थी। इसका संक्षिप्त रूप मैंने अनेक वर्ष पूर्व 'इम्प्रिंट' पत्रिका में पढ़ा था जो 'माय टू वर्ल्ड्स' शीर्षक से छपा था। यह एक आत्मकथात्मक उपन्यास है। डॉक्टर क्रोनिन ने अपने जीवन की शुरूआत वेल्स की कोयला खदान में डॉक्टर के रूप में शुरू की थी। वे बाद में लंदन आकर ग्लैमर की दुनिया के डॉक्टर बन गए थे। उन्हें कमाई तो बहुत हुई, लेकिन मन का संतोष समाप्त हो गया। अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनते हुए क्रोनिन ने चिकित्सकीय पेशे को ही अलविदा कह दिया और वे पूर्णकालिक लेखक बन गए। प्रसंगवश उल्लेख कर दूं कि उन्हीं के अन्य उपन्यास 'द जूडास ट्री' पर मौसम फिल्म बनी थी।
ए.जे. क्रोनिन के 1924-25 में लिखे इस आत्मकथात्मक उपन्यास से ग्रेट ब्रिटेन की स्वास्थ्य नीति में एक क्रांतिकारी परिवर्तन आया। हर नागरिक को स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध हो, इस उद्देश्य को सामने रखकर ब्रिटेन में एन.एच.एस. (नेशनल हेल्थ सर्विस) की स्थापना की गई, जो पिछले सत्तर सालों से ब्रिटिश जनता के लिए बड़ी हद तक वरदान बनी हुई है। उल्लेख करना प्रासंगिक होगा कि बिल क्लिंटन ने जब 1993 में अमेरिका का राष्ट्रपति पद संभाला तब उनकी और उनसे अधिक हिलेरी क्लिंटन की इच्छा थी कि एनएचएस का प्रयोग अमेरिका में दोहराया जाए। कारपोरेट दबाव के चलते वे ऐसा नहीं कर पाए। बराक ओबामा ने भी राष्ट्रपति बनने के बाद इस दिशा में पहल की और उनके कार्यकाल के लगभग अंत में एक नई स्वास्थ्य योजना लागू हो गई, जिसे सामान्य तौर पर ओबामा केयर के नाम से जाना जाता है। दुर्भाग्य से डोनाल्ड ट्रंप ने राष्ट्रपति बनते साथ सबसे पहला कदम ओबामा केयर को खारिज करने की दिशा में उठाया। इसके पीछे निजी बीमा कंपनियों का हाथ माना जाता है।
यह हमारे देश की विडंबना है कि हमारी स्वास्थ्य नीति भी कारपोरेट क्षेत्र और निजी बीमा कंपनियों के दबाव में है। छत्तीसगढ़ में ही आए दिन स्मार्ट कार्ड में होने वाली धांधलियों की खबरें पढ़ने मिलती हैं। अभी जब राज्य सरकार ने स्मार्ट कार्ड की सीमा तीस हजार से बढ़ाकर पचास हजार करने का विचार किया तो किसी निजी बीमा कंपनी ने मनमानी प्रीमियर दर पर अनुबंध हासिल कर लिया जो जल्दी ही संदेह के घेरे में आ गया और जांच होने पर अनुबंध निरस्त करना पड़ा।  मेरा कहना है कि केन्द्र सरकार हो या राज्य सरकार, उन्हें ऐसे दबाव से मुक्त होकर काम करना चाहिए। प्रधानमंत्री ने तो 'स्वच्छ भारत' का नारा दिया है। यदि 'स्वस्थ भारत' नहीं होगा तो अमिताभ बच्चन लाख विज्ञापन कर लें, स्वच्छ भारत की कल्पना साकार नहीं हो सकती। मेरे अनेक मित्र डॉक्टर हैं और उनमें से कई श्रेष्ठ साहित्य के अध्येता और उत्तम फिल्मों के दर्शक हैं। वे अवश्य ए.जे. क्रोनिन के बारे में जानते हों। इन मित्रों से ही मेरी आशा है कि वे अपने हमपेशा साथियों को प्रेरित करेंगे कि हर नागरिक को स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध हो।
देशबंधु में 27 जुलाई 2017 को प्रकाशित